सनातन धर्म में पितृ पक्ष के समय का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है. वर्ष 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर, शनिवार को भाद्रपद पूर्णिमा से हो रही है, जो सर्वपितृ अमावस्या तक जारी रहेगी. पितृ पक्ष में तर्पण का बड़ा महत्व है. अपने पूर्वजों के निमित्त हमें तर्पण अवश्य करना चाहिए. इस पावन अवसर पर सही विधि और मंत्रों के साथ किया गया जल अर्पण पूर्वजों को तृप्त करता है. यदि आप भी अपने पूर्वजों को जल देकर उनका आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो चलिए जानते हैं कि तर्पण के समय कौन सी सामग्री का उपयोग करना चाहिए और किन मुख्य मंत्रों का उच्चारण करना जरूरी माना जाता है.
जल अर्पण की विधि और अंगूठे से जल गिराने का नियम:- तर्पण करने के लिए सबसे पहले एक जल के पात्र में काले तिल, जौ, चावल और पुष्प मिलाए जाते हैं. इसके बाद हाथ के अंगूठे के पास वाले हिस्से से जल गिराया जाता है. जल गिराते हुए सबसे पहले अपने गोत्र का नाम बोलें. गोत्र के नाम के बाद अपने पूर्वजों का नाम और उस दिन की तिथि बोलना अनिवार्य होता है. यह सब बोलने के बाद ही मंत्र का उच्चारण किया जाता है. पात्र में सामग्री मिलाने और गोत्र तथा नाम का उच्चारण करने के बाद अंगूठे के पास से जल अर्पित करने से पूर्वजों तक जल पहुंचता है. इस सही प्रक्रिया का पालन करने से तर्पण कर्म पूर्ण होता है और पितृ देव अत्यंत प्रसन्न होते हैं.
पितृ तर्पण मंत्र कौन से हैं:- तर्पण के दौरान सही मंत्रों का उच्चारण करना बहुत महत्वपूर्ण होता है. गोत्र, नाम और तिथि बोलने के बाद इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है: ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च. नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:॥ या फिर आप इस मंत्र का भी उच्चारण कर सकते हैं: ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः. इस प्रकार विधि-विधान के साथ सही मंत्रों का उच्चारण करके हम अपने पूर्वजों का तर्पण कर सकते हैं. सही मंत्र पढ़ने से उनको पूर्ण तृप्ति मिलती है, वह हमेशा प्रसन्न रहते हैं, अपना आशीर्वाद सदैव हम पर बनाए रखते हैं और हमें सदा सभी दोषों से मुक्त रखते हैं. इसलिए तर्पण में इन पवित्र मंत्रों का जाप अवश्य करना चाहिए.
तर्पण विधि और मंत्र जाप के मुख्य नियम
1. तर्पण सामग्री: एक जल के पात्र में काले तिल, जौ, चावल और पुष्प मिलाएं.
2. अंगूठे से जल: हाथ के अंगूठे के पास वाले हिस्से से जल नीचे गिराएं.
3. नाम व गोत्र: जल गिराते समय सबसे पहले अपने गोत्र, पूर्वजों के नाम और तिथि बोलें.
4. मंत्र का उच्चारण: “ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च…” या “ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः” मंत्र का जाप करें.
5. पितरों की कृपा: सही विधि-विधान से तर्पण करने से पूर्वज तृप्त होकर सभी दोषों से मुक्त रखते हैं.




