नवापारा: छत्तीसगढ़ के हजारों नगर सैनिक (होमगार्ड) आज भी अपने वैधानिक अधिकारों और सेवा सुविधाओं के इंतजार में हैं। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद अब तक आदेश का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो सका है। इससे प्रदेशभर के नगर सैनिकों में नाराजगी और असंतोष बढ़ता जा रहा है।
नगर सैनिकों का कहना है कि वे वर्षों से कानून-व्यवस्था बनाए रखने, आपदा प्रबंधन, चुनाव ड्यूटी, वीआईपी सुरक्षा और विभिन्न सरकारी कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें नियमित कर्मचारियों के अनुरूप सुविधाएं और अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं। सर्वोच्च अदालत के निर्देश के बाद नगर सैनिकों को उम्मीद थी कि राज्य सरकार जल्द आवश्यक कार्रवाई करते हुए उन्हें राहत प्रदान करेगी, लेकिन आदेश के क्रियान्वयन में हो रही देरी से उनके बीच निराशा का माहौल है। उनका कहना है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद उन्हें राहत नहीं मिलती तो न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
राज्य सरकार की याचिका हुई थी खारिज
नगर सैनिकों की सेवा सुविधाओं और अधिकारों से जुड़े मामले में लंबे समय से कानूनी लड़ाई चल रही थी। इस मामले में 13 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया था। इसके साथ ही उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य शासन को तीन माह के भीतर आदेश का पालन करने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नगर सैनिकों में उम्मीद जगी थी कि वर्षों से लंबित मांगों और सेवा संबंधी सुविधाओं को लेकर सरकार जल्द निर्णय लेगी, लेकिन तय समय सीमा समाप्त होने के बाद भी आदेश का पालन नहीं किया गया है।
गृह विभाग को थी आदेश की जानकारी
मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया है कि गृह विभाग ने 12 मार्च 2026 को जारी अपने आधिकारिक पत्र में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लेख किया था। पत्र के अनुसार शासन ने नगर सैनिकों की सेवा शर्तों और सुविधाओं में आवश्यक संशोधन के लिए विधिक राय भी मांगी थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार को न्यायालय के आदेश की पूरी जानकारी थी और प्रक्रिया शुरू करने के संकेत भी मिले थे। बावजूद इसके अब तक आदेश के पालन को लेकर कोई अंतिम निर्णय या अधिसूचना जारी नहीं की गई है।
जवाबदेही पर उठ रहे सवाल
अब नगर सैनिक सवाल उठा रहे कि जब राज्य सरकार की एसएलपी खारिज हो चुकी है और आदेश के पालन के लिए निर्धारित तीन माह की अवधि भी समाप्त हो चुकी है तो फिर क्रियान्वयन में देरी क्यों हो रही है? कानूनी और प्रशासनिक हलकों में भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि सुप्रीम काेर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद आदेश लागू न होने की स्थिति में जवाबदेही किसकी तय होगी। क्या संबंधित विभागों से स्पष्टीकरण लिया जाएगा या फिर नगर सैनिकों को अपने अधिकारों के लिए एक बार फिर न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी?



