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ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला एकादशी पर किन स्थितियों में पिया जा सकता है पानी? जानें व्रत के नियम…

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हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाता है. ये व्रत सभी एकादशी व्रतों का पुण्य फल प्रदान करने वाला माना जाता है. निर्जला एकादशी का व्रत सबसे कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें लोग बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना में लीन रहते हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस एकादशी व्रत को पांडु पुत्र भीम ने रखा था. इसलिए इसको भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं. धार्मिक मान्यता है कि ये व्रत सभी एकादशी व्रतों का पुण्य फल दिलाने के साथ-साथ भगवान विष्णु की विशेष कृपा भी दिलाता है.

मान्यता ये भी है कि निर्जला एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से मृत्यु के बाद मोक्ष का मार्ग खोलता है. इस साल निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून को रखा जाएगा. चूंकि ये व्रत ज्येष्ठ मास में पड़ता है और इस समय बहुत अधिक गर्मी पड़ती है. ऐसे में तेज गर्मी, कमजोरी या स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की वजह से बहुत ज्यादा प्यास लग सकती है. ऐसे में लोगों के मन में ये सावल आता है कि वो कौन सी स्थितियां जब इस व्रत में जल ग्रहण किया जा सकता है? आइए जानते हैं व्रत के नियम.

सेहत बिगड़े तो ग्रहण किया जा सकता है जल:- निर्जला एकादशी का संकल्प जल त्याग का होता है. ऐसे में सामान्य स्थितियों में पानी पीना इस व्रत में वर्जित होता है, लेकिन अगर सेहत ज्यादा बिगड़ जाए या जीवन पर संकट जैसी स्थिति बन जाए तो धर्म शास्त्रों में कुछ विशेष परिस्थितियों में राहत का उल्लेख किया गया है. कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसी आपात स्थिति में व्यक्ति अपनी सेहत और क्षमता को देखकर पानी पी सकता है. क्योंकि शरीर की रक्षा को जरूरी माना गया है.

कमजोरी महसूस होने पर भी पी सकते हैं पानी:- अगर किसी व्यक्ति को निर्जला एकादशी व्रत के दौरान अधिक कमजोरी महसूस होने लगे तो वो भगवान विष्णु की पूजा के बाद उनका स्मरण करके जल पी सकता है. कुछ पंरपराओं में मान्यता ये भी है कि अगर व्रत पूरा करने की संभावना न हो तो सूर्यास्त के बाद कुछ समय इंतजार करके जल ग्रहण किया जा सकता है. हालांकि, अलग-अलग स्थानों और परंपराओं में व्रत के नियमों में भिन्नता हो सकती है.

जल का त्याग क्या दर्शाता है:- निर्जला एकादशी व्रत में जल का त्याग सिर्फ एक नियम नहीं है, बल्कि ये आत्मसंयम और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है. माना जाता है कि जब व्यक्ति एक दिन अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करता है, तो उसके मन को मजबूती मिलती है. ये व्रत धैर्य और संयम की सीख देता है. साथ ही इस दिन श्रद्धा से पूजा-पाठ करने पर भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है.

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