हिंदू धर्म में पूजा-पाठ, हवन, मांगलिक कार्यों या नए वाहन एवं मकान की खरीदारी के समय कलाई पर लाल और पीले रंग का सूती धागा बांधने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इस धागे को आम बोलचाल में मौली या कलावा कहा जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसे कलाई पर ही क्यों बांधा जाता है? क्या यह केवल एक परंपरा है या इसके पीछे कोई गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक रहस्य भी छिपा है
धार्मिक और पौराणिक महत्व:- मौली शब्द का अर्थ होता है ‘सबसे ऊपर’ या ‘मस्तक’. इसे भगवान शिव के एक नाम चंद्रमौली से भी जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ है सिर पर चंद्रमा धारण करने वाला. कलावा बांधने की परंपरा के पीछे कई पौराणिक कथाएं और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं.
राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा:- मान्यता है कि कलावा बांधने की परंपरा की शुरुआत माता लक्ष्मी ने की थी. पौराणिक कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया था. इसी कारण आज भी कलावा बांधते समय पंडित इस मंत्र का उच्चारण करते हैं:
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।”
अर्थ: जिस रक्षासूत्र से महाबली दानवराज राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षासूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं. हे रक्षासूत्र! तुम अपनी जगह से विचलित न होना और सदैव इस व्यक्ति की रक्षा करना.
मौली किस हाथ में बांधना चाहिए:- शास्त्रों में कलावा बांधने के कुछ विशेष नियम बताए गए हैं, जिनका पालन शुभ माना जाता है.
- पुरुष और अविवाहित कन्याएं: इन्हें दाहिने हाथ की कलाई पर कलावा बांधना चाहिए.
- विवाहित महिलाएं: विवाहित स्त्रियों को बाएं हाथ की कलाई पर कलावा धारण करना चाहिए.
- मुट्ठी बंद रखने का नियम: कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में धागा बांधा जा रहा हो, उसकी मुट्ठी बंद रखनी चाहिए तथा दूसरा हाथ सिर पर रखना चाहिए. इसे संकल्प और एकाग्रता का प्रतीक माना जाता है.
- परतों की संख्या: कलाई पर मौली को 3, 5 या 7 बार लपेटकर बांधना शुभ माना जाता है.



