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1076 पर शिकायत, 11:10 का वीडियो और 11:18 की छुट्टी, बीएमओ-सीएमएचओ की जांच पर उठ रहे गंभीर सवाल

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वीडियो साक्ष्य अधिकारियों को दिखाने का दावा, फिर भी शिकायतकर्ता असंतुष्ट; सवाल—जांच मौके पर हुई या ऑफिश में ही बैठे बैठे ?

अनीता गर्ग अमन पथ ब्यूरो चीफ रायगढ़ :  छत्तीसगढ़ सरकार ने आम जनता की शिकायतों के त्वरित और प्रभावी निराकरण के लिए मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 शुरू की है। उद्देश्य साफ है—जनता को छोटी-बड़ी शिकायतों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें और शिकायत पर निष्पक्ष कार्रवाई हो। लेकिन रायगढ़ जिले के स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा एक मामला अब इसी भरोसे की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है।मामला स्वास्थ्य विभाग में सुपरवाइजर के पद पर पदस्थ लालजी राठौर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि टीकाकरण के विशेष दिवस के दौरान लालजी राठौर अपने घर पर कथित रूप से मरीज का उपचार कर रहे थे। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो भी बनाया गया, जिसे शिकायतकर्ता के अनुसार बाद में पीएमओ, खंड चिकित्सा अधिकारी और सीएमएचओ/जिला स्वास्थ्य अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
अब मामला इसलिए गंभीर हो गया है क्योंकि शिकायतकर्ता के अनुसार सुबह करीब 11:10 बजे लालजी राठौर के कथित रूप से घर पर मरीज का उपचार करते हुए वीडियो बनाया गया और लगभग 11:18 बजे उनके द्वारा व्हाट्सऐप के माध्यम से छुट्टी का आवेदन भेजा गया।

यानी वीडियो और छुट्टी आवेदन के बीच महज आठ मिनट का अंतर।यहीं से जांच व्यवस्था पर सवाल शुरू होते हैं।11:10 बजे इलाज, 11:18 बजे छुट्टी—इन आठ मिनटों का हिसाब कौन देगा?यदि शिकायतकर्ता के आरोप सही हैं तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि 11:10 बजे लालजी राठौर की ड्यूटी कहां थी।चूंकि मामला टीकाकरण के विशेष दिवस का बताया जा रहा है, इसलिए उस दिन उनकी निर्धारित ड्यूटी, उपस्थिति, टीकाकरण संबंधी जिम्मेदारी और कार्यस्थल का विभागीय रिकॉर्ड जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।यदि वे ड्यूटी पर थे तो घर पर कथित रूप से मरीज देखने की स्थिति कैसे बनी?यदि वे ड्यूटी पर नहीं थे तो उनकी अनुपस्थिति किस आधार पर स्वीकृत थी?और यदि 11:18 बजे व्हाट्सऐप से छुट्टी का आवेदन भेजा गया तो उस आवेदन को किस अधिकारी ने, कितने बजे और किस आधार पर स्वीकार किया?सिर्फ व्हाट्सऐप पर आवेदन भेज देना अपने आप में छुट्टी स्वीकृत होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अवकाश स्वीकृति सक्षम अधिकारी और विभागीय नियमों के अनुसार होती है। इसलिए यह जांचना जरूरी है कि आवेदन के बाद वास्तव में अवकाश स्वीकृत हुआ था या नहीं और उसका कार्यालयीन अभिलेख क्या कहता है।

तत्काल छुट्टी की परिस्थिति भी बने जांच का हिस्सा
शिकायतकर्ता का कहना है कि जब इस संबंध में बीएमओ से जानकारी ली गई तो लालजी राठौर द्वारा छुट्टी आवेदन किए जाने की बात बताई गई। ऐसे में विभाग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि तत्काल अवकाश किन परिस्थितियों में स्वीकृत किया गया और उस समय संबंधित कर्मचारी द्वारा किस आपात अथवा अत्यावश्यक कारण का उल्लेख किया गया था।यदि तत्काल छुट्टी स्वीकृत करने के लिए विशेष परिस्थिति आवश्यक थी तो वह परिस्थिति क्या थी? क्या उसका कोई प्रमाण विभागीय रिकॉर्ड में है? आवेदन कब प्राप्त हुआ और स्वीकृति कब दी गई?इन सवालों का जवाब सामने आना इसलिए जरूरी है क्योंकि मामला सामान्य कार्य दिवस का नहीं, बल्कि शिकायतकर्ता के अनुसार टीकाकरण के विशेष दिवस का है।

वीडियो साक्ष्य सामने था तो मौके पर जांच क्यों नहीं?
शिकायतकर्ता का कहना है कि उसने केवल आरोप नहीं लगाए, बल्कि लालजी राठौर के कथित रूप से मरीज देखने का वीडियो भी संबंधित अधिकारियों को दिखाया।
अब सवाल बीएमओ और सीएमएचओ से है—
यदि वीडियो सामने था तो क्या उसकी जांच की गई?
क्या जांच अधिकारी मौके पर गया?
क्या कथित मरीज से पूछताछ की गई?
क्या आसपास के ग्रामीणों के बयान लिए गए?
क्या घर पर कथित क्लीनिक जैसी गतिविधि की भौतिक जांच हुई?
क्या वहां मौजूद दवाइयों की जांच की गई?

क्या लालजी राठौर की चिकित्सकीय योग्यता और पंजीयन की पुष्टि की गई?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या 11:10 बजे के वीडियो और 11:18 बजे के छुट्टी आवेदन को आपस में जोड़कर पूरा घटनाक्रम जांचा गया?यदि इन बिंदुओं की जांच नहीं हुई तो शिकायतकर्ता की असंतुष्टि स्वाभाविक रूप से गंभीर सवाल खड़े करती है।
क्या जांच सिर्फ स्पष्टीकरण लेकर पूरी हो गई?शिकायतकर्ता के अनुसार मामले में लालजी राठौर को स्पष्टीकरण देने के लिए पत्र भी दिया गया था। लेकिन किसी शिकायत की निष्पक्ष जांच केवल संबंधित कर्मचारी का पक्ष जान लेने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।शिकायत में वीडियो है तो वीडियो की जांच होनी चाहिए। मरीज देखने का आरोप है तो मौके का सत्यापन होना चाहिए। दवा देने का आरोप है तो दवाइयों का स्रोत और वैधता जांची जानी चाहिए। ड्यूटी से अनुपस्थिति का सवाल है तो उपस्थिति पंजिका और ड्यूटी चार्ट देखा जाना चाहिए। छुट्टी का आवेदन है तो आवेदन और स्वीकृति का समय जांचा जाना चाहिए।वरना सवाल उठेगा—जांच सच जानने के लिए हुई थी या शिकायत को बंद करने के लिए?

लालजी राठौर के कथित निजी उपचार पर भी गंभीर सवाल
यदि लालजी राठौर वास्तव में अपने घर पर मरीजों को देखते और दवाइयां देते हैं, जैसा शिकायतकर्ता आरोप लगा रहा है, तो यह भी जांच का विषय है कि उनके पास मरीजों का उपचार करने की वैध चिकित्सकीय योग्यता और पंजीयन है या नहीं।यदि उनके पास वैध योग्यता और अनुमति है तो संबंधित दस्तावेज सामने रखे जा सकते हैं। यदि नहीं है तो फिर मरीजों का उपचार और दवा वितरण किस अधिकार से किया जा रहा था, यह गंभीर प्रश्न बन जाता है।साथ ही यह भी जांच जरूरी है कि कथित रूप से मरीजों को दी जाने वाली दवाइयां कहां से आती हैं, कौन-सा औषधि विक्रेता उन्हें उपलब्ध कराता है, क्या उनके बिल हैं, दवाइयों की गुणवत्ता क्या है और उन्हें रखने अथवा वितरित करने की वैध अनुमति है या नहीं।

ग्रामीणों की मजबूरी को अवैध इलाज का लाइसेंस नहीं बनाया जा सकता
रायगढ़ के ग्रामीण अंचलों में कई गांवों से अस्पताल और विशेषज्ञ चिकित्सकीय सुविधाएं दूर हैं। सामान्य बीमारी या छोटे-मोटे उपचार के लिए ग्रामीण स्थानीय स्तर पर उपलब्ध व्यक्ति पर भरोसा कर लेते हैं। तत्काल दवा मिल जाने से उन्हें राहत भी महसूस होती है।
लेकिन गंभीर बीमारी में यही व्यवस्था जानलेवा साबित हो सकती है। कई बीमारियों का सही उपचार बिना जांच, उचित चिकित्सकीय ज्ञान और विशेषज्ञ सलाह के संभव नहीं होता। गलत दवा या गलत उपचार से बीमारी बिगड़ सकती है और अस्पताल पहुंचने में देरी मरीज के लिए भारी पड़ सकती है।

कल यदि किसी मरीज की हालत बिगड़ती है या उसकी जान चली जाती है तो सवाल उठेगा—उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
कुछ राजनीतिक या स्थानीय प्रभावशाली लोगों द्वारा ऐसे व्यक्तियों को ग्रामीणों के लिए उपयोगी बताकर समर्थन देने की बात भी सामने आती रही है। लेकिन जनता की मजबूरी और तत्काल दवा मिलने को आधार बनाकर बिना वैध योग्यता या अनुमति के उपचार को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

ग्रामीणों को इलाज चाहिए, लेकिन सुरक्षित और योग्य इलाज चाहिए।
बीएमओ-सीएमएचओ की भूमिका पर उठ रहे सवालों का जवाब जांच से ही
इस मामले में शिकायतकर्ता की ओर से बीएमओ और सीएमएचओ पर संबंधित कर्मचारी को बचाने के प्रयास का आरोप लगाया जा रहा है। यह आरोप अभी सिद्ध नहीं है, लेकिन जिस जांच पर शिकायतकर्ता ने असंतोष जताया है, उसके कारण विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर सवाल जरूर खड़े हो रहे हैं।यदि बीएमओ और सीएमएचओ स्तर की जांच पूरी तरह निष्पक्ष है तो विभाग को यह स्पष्ट करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि जांच किसने की, कब की, मौके पर क्या पाया, कौन-कौन से दस्तावेज देखे गए और शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत वीडियो साक्ष्य पर क्या निष्कर्ष निकाला गया।

निष्पक्ष जांच को पारदर्शिता से डरने की जरूरत नहीं होती।
1076 की विश्वसनीयता भी दांव पर
सबसे बड़ा प्रश्न अब मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 को लेकर है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि उसे शिकायत के निराकरण की जानकारी तो मिली, लेकिन जिस तरीके से जांच हुई और जिस आधार पर निष्कर्ष दिया गया, उससे वह संतुष्ट नहीं है।

ऐसे में शासन स्तर से यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि 1076 की शिकायत किस अधिकारी को भेजी गई, जांच किसने की, क्या वह स्वतंत्र अधिकारी था, क्या उसने मौके का भौतिक सत्यापन किया और क्या शिकायतकर्ता द्वारा दिए गए वीडियो को जांच में शामिल किया गया?यदि शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की जांच किए बिना केवल विभागीय जवाब के आधार पर शिकायत समाप्त कर दी गई, तो यह निश्चित रूप से शिकायत निवारण व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करेगा।

अब कागजी खानापूर्ति नहीं, स्वतंत्र जांच की जरूरत
इस पूरे मामले में अब बेहतर होगा कि स्वास्थ्य विभाग से बाहर के किसी वरिष्ठ और सक्षम अधिकारी से स्वतंत्र जांच कराई जाए। 11:10 बजे बनाए गए वीडियो, 11:18 बजे भेजे गए छुट्टी आवेदन, ड्यूटी चार्ट, उपस्थिति पंजिका, अवकाश स्वीकृति, कथित मरीज, दवाइयों के स्रोत और लालजी राठौर की चिकित्सकीय योग्यता—सभी बिंदुओं की जांच एक साथ हो।

साथ ही यह भी देखा जाए कि बीएमओ और सीएमएचओ स्तर पर पहले की गई जांच में कौन-कौन से साक्ष्य देखे गए और किस आधार पर निष्कर्ष निकाला गया।यदि लालजी राठौर के खिलाफ शिकायत निराधार है तो उन्हें पूरी तरह क्लीन चिट मिले और आरोप लगाने वाले तथ्यहीन साबित हों। लेकिन यदि शिकायत में तथ्य हैं तो पद या विभागीय पहचान किसी के लिए ढाल नहीं बननी चाहिए।आखिर सवाल सिर्फ एक कर्मचारी का नहीं, ग्रामीणों की सेहत और सरकारी व्यवस्था पर जनता के भरोसे का है।11:10 बजे का कथित वीडियो और 11:18 बजे का छुट्टी आवेदन अब इस पूरे मामले की अहम कड़ी है। इन आठ मिनटों का सच सामने आएगा तो शायद यह भी साफ हो जाएगा कि मामला वास्तव में क्या था और जांच में क्या छूट गया।

नोट: इस समाचार में लालजी राठौर, बीएमओ एवं सीएमएचओ से संबंधित आरोप शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी एवं उसके दावों पर आधारित हैं। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है। संबंधित अधिकारी एवं कर्मचारी का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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