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साइडिंग चल रही या धूल का कारखाना? टेरम की सांसों पर कारीछापर का पहरा, Bag Filter बना शोपीस !

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24 घंटे उड़ते धूल के गुबार से ग्रामीण परेशान, बच्चों की यूनिफॉर्म से लेकर खेतों की फसल तक पर असर का आरोप; ग्रामीणों ने कहा—पहले धूल रोकिए, फिर कोयला ढोइए

अनीता गर्ग अमन पथ ब्यूरो चीफ रायगढ़ :  जिले के घरघोड़ा विकासखंड के ग्राम पंचायत टेरम क्षेत्र में कारीछापर कोल साइडिंग से उड़ने वाली धूल को लेकर ग्रामीणों की परेशानी लगातार बढ़ने का दावा किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि साइडिंग में कोयले की लोडिंग-अनलोडिंग और आवाजाही तो लगातार जारी है, लेकिन धूल को नियंत्रित करने के लिए लगाए गए Bag Filter और Fog Cannon जैसे इंतजाम लंबे समय से या तो काम नहीं कर रहे हैं या पर्याप्त रूप से संचालित नहीं किए जा रहे हैं। ऐसे में साइडिंग से उठने वाला धूल का गुबार आसपास के गांव और मुख्य सड़क तक पहुंच रहा है।

ग्रामीणों के अनुसार कारीछापारा साइडिंग के गेट से घरघोड़ा-धरमजयगढ़ मुख्य मार्ग तक कई बार इतनी धूल फैल जाती है कि सड़क पर चलने वाले दोपहिया वाहन चालकों को सामने का रास्ता साफ दिखाई देना मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि करीब दस फीट तक की दूरी पर भी दृश्यता प्रभावित होने जैसी स्थिति बन जाती है। अगर सड़क पर एक तरफ भारी वाहन और दूसरी तरफ धूल का गुबार हो, तो दुर्घटना का खतरा कितना बढ़ सकता है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि समस्या केवल सड़क तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास रहने वाले लोगों के घरों और रोजमर्रा की जिंदगी तक इसका असर पहुंच रहा है।

सबसे ज्यादा चिंता स्कूल जाने वाले बच्चों को लेकर जताई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि साइडिंग से उड़ने वाली धूल के कारण बच्चों की स्कूल यूनिफॉर्म तक कुछ ही समय में गंदी हो जाती है। सुबह बच्चे स्कूल जाने के लिए घर से निकलते हैं, लेकिन रास्ते में उड़ती धूल उनके कपड़ों और शरीर पर जम जाती है। ग्रामीणों का सवाल है कि जिस रास्ते से रोजाना बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और आम लोग गुजरते हैं, वहां धूल नियंत्रण के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं।

ग्रामीणों ने स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि लंबे समय से धूल के संपर्क में रहने के कारण बच्चों और बुजुर्गों में खांसी और सांस लेने में परेशानी जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं। कुछ लोगों ने आंखों में जलन और त्वचा संबंधी परेशानी की भी बात कही है। हालांकि इन स्वास्थ्य समस्याओं का वास्तविक कारण क्या है, यह चिकित्सकीय जांच और पर्यावरणीय अध्ययन के बाद ही स्पष्ट हो सकता है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि लगातार उड़ती धूल को लेकर प्रशासन और संबंधित प्रबंधन को गंभीरता से जांच करानी चाहिए।

सवाल केवल घरों और सड़कों तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार साइडिंग के आसपास स्थित खेतों पर भी कोयले की धूल जम रही है। किसानों का कहना है कि फसलों पर धूल की परत बैठने से कृषि उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है। ग्रामीण चाहते हैं कि कृषि और पर्यावरण विभाग की टीम मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करे और यदि फसलों पर प्रदूषण का प्रभाव पड़ रहा है तो उसकी वैज्ञानिक जांच भी कराई जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि कारीछापारा साइडिंग से निकलने वाली धूल की समस्या कोई एक-दो दिन की नहीं है। कई महीनों से परेशानी बनी हुई है। ग्रामीणों के अनुसार उन्होंने इस संबंध में SECL बारौड़ सब एरिया के प्रबंधक अवधेश कुमार झा को कई बार मौखिक रूप से जानकारी दी, लेकिन अपेक्षित समाधान नहीं हुआ। अब ग्रामीणों का कहना है कि केवल मौखिक शिकायत से बात नहीं बनेगी और समस्या के स्थायी समाधान के लिए संबंधित विभागों को मौके पर पहुंचकर स्थिति देखनी होगी।

ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि यदि साइडिंग में Bag Filter और Fog Cannon जैसी व्यवस्थाएं धूल नियंत्रण के लिए लगाई गई हैं, तो फिर उनका वास्तविक उपयोग कितना हो रहा है? अगर उपकरण खराब हैं तो उन्हें ठीक कराने की जिम्मेदारी किसकी है? अगर उपकरण चालू हैं तो साइडिंग से बाहर तक लगातार धूल का गुबार क्यों पहुंच रहा है? और यदि पानी के छिड़काव की व्यवस्था है तो क्या वह पर्याप्त आवृत्ति और निर्धारित मानकों के अनुसार हो रही है?

ग्रामीणों का कहना है कि कोयला ढुलाई और औद्योगिक गतिविधियां क्षेत्र के विकास और रोजगार से जुड़ी हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आसपास रहने वाले लोगों को प्रदूषण और धूल की परेशानी के साथ जीने के लिए छोड़ दिया जाए। उनका कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन विकास के साथ पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है।

ग्रामीण अब इस मामले में लिखित शिकायत की तैयारी कर रहे हैं। बताया गया है कि कलेक्टर रायगढ़, छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल, एसडीएम घरघोड़ा और SECL महाप्रबंधक को शिकायत भेजकर समस्या की जांच और कार्रवाई की मांग की जाएगी। ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि जब तक धूल नियंत्रण की व्यवस्था प्रभावी ढंग से काम नहीं करती, तब तक साइडिंग में लोडिंग-अनलोडिंग की गतिविधियों की समीक्षा की जाए। इसके साथ ही साइडिंग से मुख्य सड़क तक नियमित और पर्याप्त पानी का छिड़काव कराया जाए।

ग्रामीणों ने दिन में कई बार पानी के छिड़काव की मांग भी रखी है। उनका कहना है कि केवल कागजों में पानी का छिड़काव दिखाने से समस्या खत्म नहीं होगी। मौके पर वास्तविक व्यवस्था दिखाई देनी चाहिए। उनका कहना है कि यदि धूल नियंत्रण के लिए चार बार पानी का छिड़काव आवश्यक है तो वह नियमित रूप से होना चाहिए और इसकी निगरानी भी की जानी चाहिए।

मामला अब केवल धूल उड़ने की शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ग्रामीण इसे सड़क सुरक्षा, बच्चों की परेशानी, कृषि और स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा बता रहे हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण किया जाएगा या शिकायतें कागजों में घूमती रहेंगी?

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वे आंदोलन और चक्काजाम जैसे कदम उठाने पर मजबूर हो सकते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी औद्योगिक गतिविधि को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोयले की ढुलाई के साथ धूल नियंत्रण की जिम्मेदारी भी पूरी तरह निभाई जाए।

कारीछापारा कोल साइडिंग में Bag Filter, Fog Cannon, पानी के छिड़काव और अन्य धूल नियंत्रण व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति क्या है, इसकी स्वतंत्र जांच से ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी। ग्रामीणों के आरोपों के बीच संबंधित प्रबंधन और प्रशासन का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। इस खबर के प्रकाशन तक SECL और संबंधित अधिकारियों की ओर से इन शिकायतों पर कोई विस्तृत आधिकारिक पक्ष उपलब्ध नहीं हो सका है। संबंधित प्रबंधन का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

फिलहाल टेरम के ग्रामीणों का सवाल सीधा है—अगर कोयले की धूल को रोकने के लिए Bag Filter और Fog Cannon लगाए गए हैं, तो फिर गांव तक धूल का यह गुबार आखिर पहुंच क्यों रहा है? साइडिंग में कोयला भले दौड़ रहा हो, लेकिन ग्रामीण चाहते हैं कि उनकी सांसों और उनके स्वास्थ्य की कीमत पर यह रफ्तार आगे न बढ़े।

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