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FCI को हाईकोर्ट से झटका, गलत कटौती पर राइस मिल को राहत; ब्याज 12% से घटाकर 6%

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बिलासपुर :  फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) द्वारा व्यावसायिक कर और अन्य शुल्क के नाम पर की गई कटौती को हाईकोर्ट ने उचित नहीं माना है। कोर्ट ने राइस मिल के पक्ष में निचली अदालत द्वारा पारित ₹2,46,960 की वसूली की डिक्री को बरकरार रखा है। हालांकि, निचली अदालत द्वारा निर्धारित 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज को घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया गया है।

जस्टिस सुषमा सावंत की सिंगल बेंच ने FCI की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि डिक्री की राशि पर 27 मार्च 2002 यानी वाद दायर करने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिया जाए।

1998 में खराब अनाज की बिक्री के लिए जारी हुआ था टेंडर

मामला वर्ष 1998 का है। FCI ने अगस्त 1998 में रायपुर के विभिन्न डिपो में रखे खराब अनाज की बिक्री के लिए टेंडर जारी किया था। रायपुर के गंजपारा स्थित मेसर्स सूरज बेसन एंड राइस मिल ने 1,280.41 मीट्रिक टन खाद्यान्न के लिए टेंडर प्रस्तुत किया था।

11 नवंबर 1998 को FCI ने 11,415 क्विंटल खराब अनाज के लिए मिल का टेंडर स्वीकार किया। इसकी कुल कीमत ₹65 लाख 38 हजार 110 रुपये निर्धारित की गई थी। मिल ने भुगतान के लिए किस्तों की अनुमति मांगी और व्यावसायिक कर हटाने का आग्रह किया।

इसके बाद मिल की ओर से 7 जनवरी 1999 को ₹25 लाख, 8 जनवरी को ₹30 लाख और 14 जनवरी को ₹10 लाख 38 हजार 110 रुपये जमा किए गए।

बिल से काटी गई राशि पर उठा विवाद

राइस मिल का आरोप था कि FCI ने जारी किए गए बिलों में व्यावसायिक कर समेत अन्य रकम की कटौती कर ली। अंतिम हिसाब में 11,414 क्विंटल 18 किलो माल के बदले उसे 10,944 क्विंटल 2 किलो माल ही दिया गया। अंतर की राशि के तौर पर ₹4,54,741 का बिल प्रस्तुत किया गया, लेकिन FCI की ओर से इसका भुगतान नहीं किया गया।

राशि नहीं मिलने के बाद राइस मिल ने बकाया रकम और ब्याज की वसूली के लिए सिविल वाद दायर किया। निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर वाद को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए ₹2,46,960 की डिक्री 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ पारित की थी।

हाईकोर्ट में FCI ने क्या दलील दी?

FCI की ओर से हाईकोर्ट में तर्क दिया गया कि टेंडर की शर्तों के अनुसार भुगतान में देरी होने पर दंडात्मक ब्याज और निर्धारित समय में माल नहीं उठाने पर स्टोरेज शुल्क लिया जाना उचित था। FCI ने 12 प्रतिशत ब्याज को भी अधिक बताया।

वहीं राइस मिल की ओर से निचली अदालत के फैसले का समर्थन करते हुए कहा गया कि FCI द्वारा की गई कटौतियां टेंडर की शर्तों के अनुरूप नहीं थीं।

गवाही में सामने आई अहम बात

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और साक्ष्यों की समीक्षा के दौरान FCI की गवाह लेखा चटर्जी की जिरह में दिए गए बयान को भी महत्वपूर्ण माना। गवाही में उन्होंने स्वीकार किया कि स्वीकृत टेंडर में व्यावसायिक कर की कटौती का कोई प्रावधान नहीं था।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राइस मिल के बिलों से काटी गई व्यावसायिक कर की राशि संबंधित वाणिज्यिक कर विभाग में जमा नहीं की गई थी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने FCI द्वारा की गई उक्त कटौती को टेंडर की शर्तों के अनुरूप नहीं माना और मूल ₹2,46,960 की डिक्री बरकरार रखी।

ब्याज की दर 12 से घटाकर 6 प्रतिशत

हालांकि, हाईकोर्ट ने ब्याज की दर में बदलाव किया। जस्टिस सुषमा सावंत ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 34 के तहत सामान्य परिस्थितियों में 6 प्रतिशत ब्याज उचित माना जाता है। राइस मिल की ओर से ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके आधार पर 6 प्रतिशत से अधिक ब्याज दिया जा सके।

इसलिए हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा निर्धारित 12 प्रतिशत ब्याज को घटाकर 6 प्रतिशत वार्षिक कर दिया और यह ब्याज 27 मार्च 2002 से वास्तविक भुगतान तक देने का निर्देश दिया।

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