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दिल्ली में हिरासत और प्रतिबंधों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, मेट्रो-इंटरनेट को लेकर दिए अहम निर्देश

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नई दिल्ली :  दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों को बंद रखने, इंटरनेट सेवाओं पर रोक और बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को सुनवाई की। जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने नागरिकों की आवाजाही, पेशेवर कामकाज और स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई करते हुए सामान्य स्थिति बहाल करने पर जोर दिया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि लोगों को अपने पेशे से जुड़े काम करने से नहीं रोका जाना चाहिए। कोर्ट ने मेट्रो सेवाओं को सामान्य समय-सारणी के अनुसार संचालित करने, इंटरनेट सेवा सामान्य करने और अनावश्यक बैरिकेड हटाने की बात कही। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरत के मुताबिक उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

 45 मेट्रो स्टेशन बंद करने पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि अदालत के आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास प्रतिबंधित किया गया था। उन्होंने इंटरनेट सेवाओं पर रोक और अन्य प्रतिबंधों का मुद्दा भी उठाया।

इस पर केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि दिल्ली के कुल 303 मेट्रो स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास रोका गया था। उन्होंने बताया कि सभी स्टेशन पिछली रात 10 बजे से पूरी तरह खोल दिए गए थे।

पीठ ने इस दौरान सवाल किया कि पहले 57 स्टेशन बंद होने की बात कही गई थी, जबकि बाद में 45 स्टेशन बंद करने की जानकारी दी गई। अदालत ने सरकार से पूछा कि आखिर किन आधारों पर इन स्टेशनों को बंद करने का निर्णय लिया गया था।

इंटरनेट और बैरिकेडिंग पर भी अदालत का रुख

सुनवाई में दिल्ली में इंटरनेट सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों का मामला भी उठा। याचिकाकर्ताओं की ओर से इसे नागरिकों के अधिकारों और इंटरनेट बंदी से संबंधित पूर्व न्यायिक निर्देशों के संदर्भ में देखने की मांग की गई।

अदालत ने इंटरनेट सेवाओं को सामान्य रूप से बहाल करने और शहर में लगाए गए बैरिकेड हटाने पर जोर दिया। पीठ ने कहा कि बैरिकेड केवल उन्हीं स्थानों पर रखे जाने चाहिए, जहां उनकी वास्तव में जरूरत हो।

कोर्ट ने यह भी कहा कि लोगों की आवाजाही सामान्य रहनी चाहिए। हालांकि, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की वास्तविक जरूरतों के आधार पर उचित प्रतिबंध लगाने की गुंजाइश बनी रहेगी।

 हिरासत में लिए गए लोगों का मामला भी पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से हिरासत में लिए गए लोगों के संबंध में अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया और कुछ वकीलों को अपने मुवक्किलों से मिलने में भी परेशानी हुई।

वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर प्रतिबंध और मनमानी कार्रवाई गंभीर चिंता का विषय हैं। वहीं, अन्य वकीलों ने पुलिस कार्रवाई, बैरिकेडिंग और हिरासत में लिए गए लोगों की स्थिति पर सवाल उठाए।

कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से हजारों लोगों को हिरासत में लिए जाने का दावा किया गया। हालांकि, हिरासत में लिए गए लोगों की सही संख्या और प्रत्येक मामले की स्थिति को लेकर सुनवाई के दौरान अलग-अलग दलीलें सामने आईं।

 पुलिस की कार्रवाई और नागरिक अधिकारों पर टिप्पणी

सुनवाई के दौरान पीठ ने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा को अदालत की समान जिम्मेदारी बताया। अदालत ने कहा कि पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर ऐसा कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं मिल जाता, जिससे नागरिकों के अधिकारों की अनदेखी की जा सके।

पीठ ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान से अदालत की जिम्मेदारी नहीं बदलती। पुलिसकर्मी, वकील या आम नागरिक, सभी के अधिकारों की रक्षा करना न्यायपालिका का कर्तव्य है।

वकीलों की ओर से पुलिसकर्मियों की पहचान संबंधी बैज नहीं पहनने, वकीलों को हिरासत में लेने और थानों में मुवक्किलों से मुलाकात में बाधा डालने के आरोप भी उठाए गए। इन शिकायतों पर अदालत के समक्ष विभिन्न पक्षों ने अपनी दलीलें रखीं।

 SG तुषार मेहता ने क्या कहा?

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार का विस्तृत जवाब अभी तैयार नहीं है। उन्होंने दलील दी कि जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था, उनमें से कुछ को उसी दिन शाम तक छोड़ दिया गया। इस आधार पर उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया।

अवमानना याचिका के संबंध में उन्होंने कहा कि मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं थीं और 303 में से 45 स्टेशनों पर ही प्रवेश तथा निकास रोका गया था। उन्होंने यह भी बताया कि सभी स्टेशन रात 10 बजे से खोल दिए गए थे।

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सभी पक्षों को सुनने के बाद देंगे आदेश

सुनवाई की शुरुआत में पीठ ने कहा कि असाधारण परिस्थितियों में अदालत रविवार को बैठी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सूचीबद्ध मामलों पर सुनवाई की जाएगी, जबकि सूचीबद्ध नहीं हुई याचिकाओं पर तत्काल आदेश नहीं दिया जाएगा।

जस्टिस जॉयमाला बागची ने नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर चिंता जताने वाले पक्षों को आश्वस्त किया कि अदालत मामले की पूरी सुनवाई करेगी और तथ्यों पर विचार करने के बाद आदेश देगी।

फिलहाल, इस मामले में अदालत की सुनवाई का प्रमुख केंद्र दिल्ली में सामान्य आवाजाही बहाल करना, मेट्रो सेवाओं का संचालन, इंटरनेट प्रतिबंध और हिरासत से जुड़े नागरिक अधिकारों के सवाल रहे।

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