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अभियुक्त की गैरमौजूदगी में दर्ज हुए गवाहों के बयान, सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद की सजा की रद्द

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बिलासपुर :  छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले से जुड़े हत्या के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुन्ना मंडावी को बड़ी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने उसकी उम्रकैद की सजा और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए मामले की नए सिरे से सुनवाई के निर्देश दिए हैं। अदालत ने करीब नौ साल से जेल में बंद मुन्ना को तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश भी दिया है। जमानत की शर्तें ट्रायल कोर्ट तय करेगा।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि अभियुक्त की गैरमौजूदगी में गवाहों के बयान दर्ज करना निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। अदालत ने इस मामले में सुनवाई की प्रक्रिया में हुई चूक को गंभीर मानते हुए निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले निरस्त कर दिए।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला सुकमा जिले के पुसपाल थाने में 29 दिसंबर 2017 को दर्ज अपराध से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, बेटे की मौत के बाद मुन्ना मंडावी को संदेह था कि सोमारू जादू-टोना करता था और इसी वजह से उसके बेटे की मृत्यु हुई। इसी आशंका के चलते उसने कथित तौर पर सोमारू पर कुल्हाड़ी से हमला किया, जिससे उसकी मौत हो गई।

दंतेवाड़ा सत्र न्यायालय ने 1 नवंबर 2021 को मुन्ना मंडावी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम की धारा 5 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ मुन्ना ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। इसके बाद मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

गवाहों के बयान को लेकर उठाया सवाल

सुप्रीम कोर्ट में मुन्ना मंडावी की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि अभियोजन के गवाह संख्या 2 से 6 तक के बयान उसकी गैरमौजूदगी में दर्ज किए गए थे, जबकि वह उस समय जेल में बंद था। राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने इस पर आपत्ति नहीं उठाई थी।

मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 273 का उल्लेख किया। इस प्रावधान के तहत सामान्यतः मुकदमे के दौरान साक्ष्य अभियुक्त की उपस्थिति में दर्ज किए जाने चाहिए, निर्धारित कानूनी अपवादों को छोड़कर।

जेल पास होने के बावजूद पेश नहीं किया गया आरोपी

अदालत ने मामले में इस बात पर भी ध्यान दिया कि जिला जेल अदालत से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर थी, इसके बावजूद गवाहों के बयान दर्ज किए जाने के समय मुन्ना को अदालत में पेश नहीं किया गया। शीर्ष अदालत ने कहा कि अभियुक्त की गैरमौजूदगी में गवाही दर्ज किए जाने से सुनवाई की निष्पक्षता प्रभावित हुई।

अदालत के सामने यह दलील भी रखी गई कि मुन्ना गरीब आदिवासी है और उसे कानूनी प्रावधानों की पर्याप्त जानकारी नहीं थी। वह मुश्किल से वकील की व्यवस्था कर पाया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हुई प्रक्रिया संबंधी चूक को गंभीर मानते हुए पूरी सुनवाई को दूषित घोषित कर दिया।

अब नए सिरे से होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने मुन्ना मंडावी की उम्रकैद की सजा और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए मामले की नए सिरे से सुनवाई का निर्देश दिया है। साथ ही, उसे तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया है। जमानत की शर्तें संबंधित ट्रायल कोर्ट तय करेगा।

अदालत के इस आदेश का अर्थ यह है कि मामले में नए सिरे से सुनवाई होगी। यह आदेश अपने आप में मुन्ना मंडावी को आरोपों से बरी किए जाने का फैसला नहीं है।

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