हरतालिका तीज हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे पवित्र व्रतों में गिनी जाती है. सावन और भाद्रपद मास की तीजों में इसका महत्व सबसे खास माना गया है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर इस व्रत को हरतालिका नाम क्यों दिया गया और इसके पीछे कौन सी कथा छिपी है. जानकार मानते हैं कि यह पर्व केवल पति की लंबी उम्र के लिए ही नहीं बल्कि स्त्री के आत्मबल और शक्ति का प्रतीक भी है.
हरतालिका नाम कैसे पड़ा:- हरतालिका शब्द दो संस्कृत शब्दों से बना है हरि और आलिका. हरि का अर्थ है हरण करना यानी छीन ले जाना और आलिका का अर्थ है सखी या सहेली. मान्यता है कि जब भगवान शिव ने देवी पार्वती का विवाह प्रस्ताव ठुकरा दिया था. तब निराशा में पार्वती जी ने कठोर तपस्या करने का निश्चय किया. इसी समय उनकी सहेलियां उन्हें पिता के घर से छुपाकर जंगल ले गईं ताकि वे वहां निर्बाध तपस्या कर सकें. यही घटना आगे चलकर हरतालिका नाम से प्रसिद्ध हुई.
तीज का महत्व कैसे बढ़ा:- हरतालिका तीज की कथा में यह भाव छिपा है कि सच्चे प्रेम और अटूट संकल्प के लिए स्त्री किसी भी कठिनाई को सह सकती है. पार्वती जी ने कठोर तप से शिवजी को पति रूप में पाया. धीरे-धीरे इस कथा ने महिलाओं के बीच गहरा स्थान बनाया और इसका पालन करना हर सुहागिन का कर्तव्य माना जाने लगा. यही कारण है कि यह व्रत सावन की तीज और कजरी तीज से भी ज्यादा लोकप्रिय हो गया.
केवल विवाहितों का व्रत नहीं:- अक्सर हरतालिका तीज को सिर्फ अच्छे पति की प्राप्ति के व्रत के रूप में देखा जाता है. लेकिन प्राचीन ग्रंथों के अनुसार यह व्रत स्त्री के आत्मबल और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है. इसमें तपस्या, संयम और समर्पण के वे भाव दिखते हैं जो एक स्त्री को देवी स्वरूप में स्थापित करते हैं. यही कारण है कि कई विद्वान हरतालिका तीज को स्त्रीशक्ति की उपासना का पर्व भी मानते हैं.
व्रत और पूजन विधि:- इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और मिट्टी की भगवान शिवपार्वती की प्रतिमा बनाकर उनका पूजन करती हैं. कथा श्रवण के बाद रात्रि जागरण होता है. मान्यता है कि जो स्त्री यह व्रत करती है उसके दांपत्य जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि बनी रहती है.



