Home आस्था दिवाली पर श्मशान में अघोरी किस ‘देवी’ की करते हैं पूजा?

दिवाली पर श्मशान में अघोरी किस ‘देवी’ की करते हैं पूजा?

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हर साल दिवाली का महापर्व कार्तिक मास की अमावस्या तिथि के दिन मनाया जाता है. दिवाली का महापर्व पांच दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत धनतेरस से हो जाती है. ये महापर्व भाई दूज के साथ खत्म होता है. इस बार दिवाली 20 अक्टूबर को है. दिवाली के दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है, लेकिन आइए जानते हैं कि इस दिन अघोरी शमशान में किस देवी की पूजा करते हैं. दिवाली अमावस्या के दिन पड़ती है. अमावस्या की रात तंत्र साधना की मानी जाती है. अमावस्या की रात को तंत्र साधना के लिए शक्तिशाली और विशेष समय माना जाता है, क्योंकि इस रात चंद्रमा का प्रकाश पूरी तरह से अनुपस्थित होता है और नकारात्मक शक्तियां अधिक सक्रिय होती हैं. अघोरी इस रात का उपयोग विशेष अनुष्ठानों और सिद्धि प्राप्त करने के लिए करते हैं.

महाकाली की साधना करते हैं अघोरी:- अघोरी इस रात महाकाली की पूजा और साधना करते हैं. श्मशान घाट में मंत्रोच्चारण के साथ मां काली की पूजा की जाती है. इस दिन सभी देवी-देवताओं की पूजा की जाती है और महाकाल की भी पूजा की जाती है. तंत्र की शक्ति मां की शक्ति से प्राप्त होती है. अघोरी इस दिन माता काली की पूजा करके तांत्रिक सिद्धियां हासिल करते हैं. दिवाली की रात काशी के मणिकर्णिका घाट का नजारा ऐसा होता है, जिसे दखकर कोई भी डर सकता है.

काशी में होती है बाबा औघड़ दानी की आरती:- यहां बड़े-बड़े अघोरी और तांत्रिक नरमूंडो के बीच खून से नहाते हैं. जलती चिताओं के बीच एक पैर पर खड़े होकर शव साधना करते हैं.काशी में महादेव खुद औघड़ दानी के रूप में महा शमशान में विराजते हैं. बाबा औघड़ दानी के समक्ष तामसिक क्रिया करने के लिए नरमुंडो में खप्पर भरकर 40 मिनट तक आरती होती है. महाकाल की नगरी उज्जैन में भी ऐसा ही नजारा दिखता है. वेद पुराणों और शास्त्रों में तंत्र साधना सही नहीं मानी गई है. रामचरित मानस में भी ऐसा ही लिखा है. इसे धर्म के विरुद्ध बताया गया है. गृहस्थ जीवन में रहने वाले व्यक्ति को ऐसी साधनाओं से दूर रहना चाहिए.

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