नई दिल्ली :मुंबई नगर निगम (BMC) के चुनावों ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा संदेश दिया है। पारिवारिक एकजुटता हमेशा चुनावी जीत की गारंटी नहीं होती। दरअसल, बाल ठाकरे की विरासत को बचाने और मराठी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए 20 साल बाद हाथ मिलाने वाले उद्धव और राज ठाकरे की राजनीति भाजपा-शिंदे गठबंधन के सामने फीका पड़ गया।
दरअसल, देश की सबसे अमीर नगर निगम देशभर की निगाहें थी। इसे पाने के लिए 20 सालों बाद बिछड़े हुए चचेरे भाई उद्धव और राज ठाकरे ने हाथ मिलाया, जिसका उद्देश्य मराठी वोटों को एकजुट करना और बाल ठाकरे (उद्धव के पिता और राज के चाचा) की विरासत को उनके सहयोगी एकनाथ शिंदे से वापस लेना था, लेकिन यह गठबंधन सफल नहीं हुआ।
उद्धव ठाकरे, जिन्होंने एक बार अपने लंबे समय के सहयोगी भाजपा से संबंध तोड़कर कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी के साथ गठबंधन किया था। इसके बावजूद मुबंई में शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट और एमएनएस का गठबंधन बुरी तरह पिछड़ गया। वहीं, महायुति (बीजेपी और शिंदे गुट) ने कुल 118 सीटें जीती हैं, जो BMC में बहुमत के आंकड़े से चार सीटें ज्यादा हैं।
शरद पवार की एनसीपी, जिसने शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस के साथ गठबंधन किया था, अपना खाता खोलने में विफल रही। हालांकि, अगर महा विकास अघाड़ी – कांग्रेस-शिवसेना (यूबीटी)-एनसीपी (एसपी) – गठबंधन ने एक साथ चुनाव लड़ा होता, तो स्थिति अलग हो सकती थी।



