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आंगनबाड़ी केंद्रों में अव्यवस्था का आलम,हितग्राही महिला बच्चों को नहीं मिल रहा योजना लाभ

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रिपोर्टर मुन्ना पांडेय सरगुजा : एकीकृत महिला एवं बाल विकास विभाग परियोजना कार्यालय द्वारा संचालित तमाम आंगनबाड़ी केंद्रों में पसरे अव्यवस्था के कारण हितग्राही गर्भवती शिशुवती किशोरी बालिकाओं तथा 0-5 वर्ष तक के बच्चों को रेडी टू ईट फूड,पूरक पोषण आहार गर्म भोजन नास्ते आदि शासन द्वारा प्रदत योजनाओं का समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है। दरअसल परियोजना अधिकारी के निगरानी नियंत्रण के अभाव में व्यवस्था चरमरा गई है। लखनपुर परियोजना अंतर्गत आने वाले सभी सेक्टरो में अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्र अक्सर बंद रहते हैं अथवा किसी न किसी बहाने से कार्यकर्ता अपने मुख्यालय से नदारद रहती है।

आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों की दर्ज संख्या के मुताबिक बच्चों की उपस्थिति नहीं रहती । सेक्टर सुपरवाइजर समय समय पर आंगनबाड़ी केंद्रों का निरिक्षण नहीं करते यही वजह है आंगनबाड़ी केंद्र बंद रहते हैं। इसी कड़ी में 24 जनवरी दिन शनिवार को ग्राम कोरजा नवापारा एवं उमरौली में आंगनबाड़ी केंद्र समय से पहले बंद रहा। ग्रामीणो ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र बंद रहने का कोई नया मामला नहीं है। ब्लाक क्षेत्र के सीमावर्ती आंगनबाड़ी केंद्र बंद रहने की शिकायत क ई मर्तबा हो चुकी है लेकिन इंतजाम में सुधार नहीं हो सका है सहायिका के भरोसे पर केन्द्र संचालित होता है। क्षेत्र में जिम्मेदार अधिकारी या सुपरवाइजर भी नहीं पहुंचते।

इस तरह की लचर व्यवस्था के कारण महिला एवं बच्चे विभागीय शासकीय योजनाओं का लाभ से वंचित रह जाते हैं। जन चर्चा यह भी है कि लखनपुर परियोजना क्षेत्र में कुछ ऐसे भी आंगनबाड़ी केंद्र हैं जहां वर्तमान में जिन बच्चों के नाम केन्द्र के रजिस्टर में दर्ज है। उसका नाम प्रायवेट स्कूलों में भी दर्ज है इस तरह एक बच्चे का नाम दो जगहो आंगनबाड़ी और स्कूल में दर्ज है। उपस्थिति रजिस्टर के हिसाब से यदि बारिकी से जांच किया जाये तो आंगनबाड़ी केंद्रों के पजी में वास्तविक बच्चों की दर्ज संख्या में काफी फर्क है।सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों की संख्या दिखाने के लिए यह खेल काफी समय से चल रहा है। क्षेत्र वासियों का कहना है नीजी स्कूलों में 3 साल तक के बच्चे दाखिला तो ले लेते हैं वहीं उन बच्चों का नाम आंगनवाड़ी केन्द्रों में भी दर्ज रहता है लेकिन वह आंगनबाड़ी नहीं जाते हैं ना ही आंगनबाड़ी से कोई शासकीय सुविधा का लाभ ले पाते हैं। यदि इस पहलू की सुक्ष्म निष्पक्ष जांच की जाये तो सच्चाई खुद सामने आ जायेगी। लगभग सभी आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों की दर्ज संख्या वास्तविक नहीं है। भेद है।

वर्जन 
परियोजना अधिकारी असीम शुक्ला से बंद आंगनबाड़ी केंद्रों के बारे फोन से पूछे जाने पर उन्होंने कहा मै इस सम्बंध में कोई बयान नहीं दे सकता उपर जिला अधिकारी से बात करनी होगी।

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