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मुनीर ने लगा लिया पूरा दम, अमेरिका से नहीं मिला कोई आर्थिक और सैन्य फायदा

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नई दिल्ली : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही पाकिस्तान को अहमियत देते हुए दिखे। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को लंच पर भी बुलाया। पाकिस्तान सहित सहित पूरी दुनिया में यह संदेश गया कि अब पाकिस्तान अमेरिका के प्रशासन में वही जगह हासिल करने जा रहा है, जो करीब दो दशक पहले थी। हालांकि पाकिस्तान के लिए अब तक इसका कोई ठोस हासिल नहीं रहा है।

आगामी बोर्ड ऑफ पीस बैठक में पाकिस्तान की भागीदारी को इस्लामाबाद रिश्तों में आई मजबूती के सबूत के तौर पर पेश कर रहा है। प्रतीकात्मक तौर पर दोनों देशों के रिश्तों में गर्मजोशी जरूर दिख रही है लेकिन पाकिस्तान को अमेरिका से कोई खास आर्थिक या सैन्य फायदा नहीं मिला है।

प्रेस्टीजियस हडसन इंस्टीट्यूट थिंक टैंक की दक्षिण एशियाई मामलों की विशेषज्ञ अपर्णा पांडे का कहना है कि पाकिस्तान अमेरिका के रिश्तों में बदलाव प्रतीकात्मक अधिक और संरचनात्मक कम है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की आगामी अमेरिका यात्रा बोर्ड ऑफ पीस बैठक में शामिल होने के लिए है। पाकिस्तान इसे जरूर अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में बदलाव के तौर पर पेश करना चाहेगा।

शहबाज शरीफ इस सप्ताह अमेरिका में बोर्ड ऑफ पीस की उद्घाटन बैठक में शामिल होंगे। बैठक राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से आयोजित की जा रही है। हालांकि अभी यह देखना होगा कि दोनों देशों के नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठक होती या नहीं। अपर्णा पांडे का कहना है कि पाकिस्तान के लिए अब तक अमेरिका की ओर से कुछ प्रतीकात्मक चीजें हुईं हैं कुछ संभावित निवेश की घोषणाएं हुईं लेकिन उसे कोई खास फायदा नहीं मिला है।

उन्होंने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के हाल में दिए गए उस बयान का जिक्र भी किया जिसमें उन्होंने अमेरिका पर पाकिस्तान को टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल करने और फेंक देने का आरोप लगाया था। ऐसा माना जा रहा है कि यह बयान पाकिस्तान की अमेरिका को लेकर निराशा दिखाता है।

सैन्य संबंधों पर पांडे का कहना है कि अमेरिका का मौजूदा प्रशासन ऐसा नहीं है कि वह पाकिस्तान को महंगे सैन्य उपकरण दे दे। पाकिस्तान को इसे खरीदना पड़ेगा और सऊदी अरब और तुर्किये जैसे देश इस खरीद के लिए पैसों का इंतजाम कर सकते हैं। पाकिस्तान के पास ऐसे महंगे हथियारों के लिए संसाधन नहीं है।

वहीं आर्थिक मोर्चे की बात करें तो अमेरिकी कंपनियां क्रिटिकल मिनरल्स में निवेश कर सकती है लेकिन इनके भंडार बलूचिस्तान में हैं जहां बलूच विद्रोही पाकिस्तानी सेना पर लगातार हमले कर रहे हैं। ऐसे में कंपनियां ऐसे देश में शायद ही जाना चाहें जो उनको सुरक्षा उपलब्ध कराने की स्थिति में नहीं है।

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