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आशीर्वाद देने के लिए हमेशा दाहिने हाथ का ही क्यों उठता है? जानें इसके पीछे का रहस्य

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नई दिल्ली : बचपन से ही हम देखते आए हैं कि जब भी कोई बड़ा हमें आशीर्वाद देता है, तो वह हमेशा अपने दाहिने हाथ (Right Hand) का ही इस्तेमाल करता है। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों? क्या यह सिर्फ एक परंपरा है या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है?

सनातन परंपरा में शरीर के दाहिने हिस्से को ‘शुभ’ और ‘पवित्र’ माना गया है। लेकिन, इसके पीछे के तर्क आपको हैरान कर देंगे।

1. सकारात्मक ऊर्जा का संचार 
प्राचीन शास्त्रों और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मानव शरीर ऊर्जा का एक केंद्र है। हमारे दाहिने हाथ में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) होती है। जब कोई सिद्ध पुरुष या बड़ा व्यक्ति अपना दाहिना हाथ हमारे सिर पर रखता है, तो उनके शरीर की संचित ऊर्जा और शुभ संकल्प एक विद्युत प्रवाह की तरह हमारे अंदर प्रवेश करते हैं।

आशीर्वाद देते समय अंगुलियों के पोरों से जो ऊर्जा निकलती है, वह सीधे व्यक्ति के ‘सहस्रार चक्र’ पर प्रहार करती है, जिससे मानसिक शांति का अनुभव होता है।

2. मस्तिष्क का विज्ञानहमारे मस्तिष्क की बनावट भी इस परंपरा का समर्थन करती है। हमारा शरीर क्रॉस-कनेक्टेड है। बायां मस्तिष्क शरीर के दाहिने हिस्से को नियंत्रित करता है। बायां मस्तिष्क तर्क, शुद्धि और अनुशासन का केंद्र है। इसलिए, जब हम दाहिने हाथ का इस्तेमाल करते हैं, तो वह हमारी चेतना और सक्रियता को दर्शाता है।

3. सूर्य स्वर और चंद्र स्वर योग विज्ञान के अनुसार, हमारे शरीर में दो मुख्य नाड़ियां होती हैं- इड़ा और पिंगला। दाहिना हिस्सा ‘पिंगला नाड़ी’ यानी सूर्य स्वर से जुड़ा होता है। सूर्य तेज, शक्ति और आरोग्य का प्रतीक है। दाहिने हाथ से आशीर्वाद देने का अर्थ है कि देने वाला अपनी सूर्य शक्ति के जरिए सामने वाले को आरोग्य और सौभाग्य का दान कर रहा है।

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, दान, संकल्प और आशीर्वाद जैसी सात्विक क्रियाएं हमेशा सूर्य स्वर की प्रधानता में ही फलदायी होती हैं।

4. धार्मिक और सामाजिक कारणपूजा-पाठ से लेकर भोजन करने तक, दाहिने हाथ को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि इसे ‘शुद्ध हाथ’ माना जाता है। बाएं हाथ का उपयोग आमतौर पर शरीर की सफाई के कार्यों में किया जाता है, इसलिए उसे ऊर्जा के आदान-प्रदान के लिए उपयुक्त नहीं माना गया है। दाहिना हाथ कर्मठता और धर्म का प्रतीक है।

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