Home ज्योतिष बिना जौ के अधूरी है नवरात्र पूजा, जानें ब्रह्म देव ने क्यों...

बिना जौ के अधूरी है नवरात्र पूजा, जानें ब्रह्म देव ने क्यों दिया इसे पहली फसल का दर्जा?

0

हिंदू धर्म में नवरात्र का पर्व सिर्फ शक्ति पूजन का ही नहीं, बल्कि प्रकृति के सम्मान का भी समय है। इस साल चैत्र नवरात्र का शुभारंभ 19 मार्च से हो रहा है। नवरात्र की कलश स्थापना के समय मिट्टी के पात्र में जौ बोने की परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि माता की चौकी के सामने जौ ही क्यों बोए जाते हैं? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसके पीछे एक पौराणिक कथा छिपी है, तो आइए जानते हैं क्यों जौ के बिना नवरात्र की पूजा अधूरी मानी जाती है?

सृष्टि की पहली फसल की कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान ब्रह्मा ने इस ब्रह्मांड की रचना की, तो अनाज में सबसे पहले जौ की उत्पत्ति हुई थी। इसी वजह से जौ को सृष्टि की पहली फसल माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से जौ को पवित्रता का प्रतीक भी माना गया है। ब्रह्म देव द्वारा इसे पहली फसल का दर्जा दिए जाने की वजह से इसे किसी भी देवी-देवता की पूजा या हवन में जरूर शामिल किया जाता है।

नवरात्र में इसे बोने का मतलब है कि हम सृष्टि की पहली फसल को देवी मां के चरणों में चढ़ा रहे हैं और प्रकृति के प्रति अपना आभार जाहिर कर रहे हैं।

भविष्य का संकेत देते हैं ये जौ

नवरात्र के दौरान बोए गए जौ, जिन्हें जवारे भी कहा जाता है, केवल परंपरा का हिस्सा नहीं हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, ये नौ दिनों में जिस तरह से बढ़ते हैं, वे जातक के भविष्य के बारे में कई संकेत देते हैं –

  1. हरा-भरा विकास – अगर जौ तेजी से बढ़ते हैं और उनका रंग गहरा हरा होता है, तो यह घर में सुख-समृद्धि और माता की कृपा का संकेत है।
  2. पीला रंग – अगर जौ का रंग नीचे से आधा पीला और ऊपर से हरा हो, तो यह साल के उतार-चढ़ाव वाले रहने का संकेत देता है।
  3. सफेद जौ – अगर जवारे सफेद रंग के उगते हैं, तो इसे बेहद शुभ माना जाता है। यह उन्नति का प्रतीक है।
  4. धीमी वृद्धि – अगर जौ बहुत कम उगते हैं या सूख जाते हैं, तो इसे आने वाले समय में संघर्ष का संकेत माना जाता है। ऐसे में इसके प्रभाव को कम करने के लिए देवी की विधिवत पूजा किसी जानकार पुरोहित से करानी चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here