देश में दवाओं की कीमतों को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है. आम लोगों को भले अभी ज्यादा फर्क महसूस न हो, लेकिन दवा बनाने वाली कंपनियां इस समय काफी दबाव में हैं. वजह है कच्चे माल और प्रोडक्शन से जुड़ी लागत का तेजी से बढ़ना.
कच्चे माल के महंगे होने से बढ़ी मुश्किल:- दरअसल, ग्लोबल स्तर पर चल रहे तनाव और सप्लाई चेन की दिक्कतों की वजह से कई जरूरी कच्चे पदार्थ महंगे हो गए हैं. जैसे ग्लिसरीन, प्रोपाइलीन ग्लाइकोल और दूसरे केमिकल्स, जो सिरप, ड्रॉप्स और कई तरह की दवाओं में इस्तेमाल होते हैं. इनके दाम बढ़ने से दवा बनाना पहले से ज्यादा महंगा हो गया है.
सीमित कीमत बढ़ोतरी से कंपनियां परेशान:- सरकार हर साल जरूरी दवाओं की कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की अनुमति देती है. इस बार यह बढ़ोतरी सिर्फ 0.6% रखी गई है, जो कंपनियों के मुताबिक बहुत कम है. उनका कहना है कि जिस रफ्तार से खर्च बढ़ रहा है, उसके मुकाबले यह बढ़ोतरी ऊंट के मुंह में जीरा जैसी है. फार्मा कंपनियों का कहना है कि अभी दवाओं की कीमत तय करने का सिस्टम थोक मूल्य सूचकांक (WPI) से जुड़ा हुआ है, लेकिन मौजूदा हालात में यह उतना कारगर साबित नहीं हो रहा.
आगे क्या हो सकता है असर:- इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर जल्द ही कोई राहत नहीं मिली, तो कंपनियों का मुनाफा और कम हो सकता है. इसका असर आगे चलकर दवाओं की सप्लाई पर भी पड़ सकता है. हालांकि, आम लोगों के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि जरूरी दवाओं की कीमतों में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है. लेकिन अगर लागत इसी तरह बढ़ती रही, तो आने वाले समय में इसका असर सीधे जेब पर पड़ सकता है. कुल मिलाकर, दवा कंपनियां इस समय बढ़ती लागत और सीमित कीमत बढ़ोतरी के बीच फंसी हुई हैं और अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम पर है.



