राधेश्याम सोनवानी, गरियाबंद :- भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां धान ,मक्का , गेहूं एक प्रमुख खरीफ और रबी फसल के रूप में उगाई जाती है। धान ,मक्का गेहूं की कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में पराली और डंठल शेष रह जाते हैं। अधिकांश किसान समय और संसाधनों की कमी के कारण इन अवशेषों को जलाना आसान उपाय मानते हैं, लेकिन यह प्रथा न केवल मिट्टी की उर्वरता को नुकसान पहुंचाती है बल्कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को भी गंभीर रूप से बढ़ावा देती है। वास्तव में, गेहूं की पराली बेकार नहीं होती, बल्कि यह मिट्टी के लिए एक “न्यूट्रिएंट बैंक” का कार्य करती है, जिसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और कई सूक्ष्म पोषक तत्व मौजूद रहते हैं।

जब पराली को खेत में जला दिया जाता है, तब इसमें मौजूद लगभग 80 प्रतिशत नाइट्रोजन, 25 प्रतिशत फास्फोरस और 20 प्रतिशत पोटाश नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄) और नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) जैसी ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में उत्सर्जित होती हैं, जो जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारक हैं। नाइट्रस ऑक्साइड विशेष रूप से अत्यधिक प्रभावशाली ग्रीनहाउस गैस है, जिसका तापवर्धन (Global Warming Potential) कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना अधिक होता है। इसके अलावा, पराली जलाने से ब्लैक कार्बन (Black Carbon) और सूक्ष्म कण (PM 2.5) भी उत्पन्न होते हैं, जो न केवल वायु प्रदूषण बढ़ाते हैं बल्कि हिमनदों के पिघलने और मौसम चक्र में असंतुलन का कारण बनते हैं।
पराली जलाने के कारण वायु गुणवत्ता में गिरावट आती है, जिससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, हृदय रोग और आंखों में जलन जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। यह समस्या विशेष रूप से उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान गंभीर रूप ले लेती है, जहां धुंध (Smog) की स्थिति बन जाती है। इस प्रकार, पराली जलाना केवल खेत तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह एक क्षेत्रीय और वैश्विक पर्यावरणीय संकट का रूप ले चुका है।
इसके विपरीत, यदि पराली को वैज्ञानिक तरीके से मिट्टी में मिलाया जाए, तो यह जलवायु परिवर्तन को कम करने में भी सहायक हो सकता है। पराली को मिट्टी में मिलाने से कार्बन का स्थिरीकरण (Carbon Sequestration) होता है, जिससे वातावरण में कार्बन की मात्रा कम होती है और मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ता है। यह प्रक्रिया मिट्टी की उर्वरता, जल धारण क्षमता और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को बढ़ाती है, जिससे फसल उत्पादन में दीर्घकालिक सुधार होता है।
पराली के उचित प्रबंधन के लिए यह आवश्यक है कि धान ,मक्का , गेहूं की कटाई जमीन से लगभग 2 इंच ऊपर की जाए, जिससे अवशेषों का प्रबंधन आसान हो सके। कटाई के बाद खेत में हल्की नमी बनाए रखते हुए प्रति एकड़ 20–25 किलोग्राम यूरिया का छिड़काव करना चाहिए और फिर रोटावेटर या कल्टीवेटर की सहायता से पराली को मिट्टी में मिला देना चाहिए। पराली में कार्बन की मात्रा अधिक और नाइट्रोजन की मात्रा कम होती है, इसलिए यूरिया डालने से कार्बन-नाइट्रोजन (C:N) अनुपात संतुलित होता है और सूक्ष्मजीव तेजी से सक्रिय होकर अपघटन प्रक्रिया को गति देते हैं। लगभग 20 से 30 दिनों के भीतर यह पराली सड़कर जैविक खाद में परिवर्तित होने लगती है।
इस प्रक्रिया से मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, मिट्टी की संरचना सुधरती है और उसकी जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है। साथ ही, रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है, जिससे खेती की लागत घटती है और किसानों की आय में सुधार होता है। यह विधि न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी सहायक है।
अतः यह स्पष्ट है कि पराली को जलाना एक अल्पकालिक और हानिकारक उपाय है, जो मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य—तीनों के लिए नुकसानदायक है। इसके विपरीत, पराली को मिट्टी में मिलाना एक दीर्घकालिक और टिकाऊ समाधान है, जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है, जलवायु परिवर्तन को कम करने में योगदान देता है और कृषि को अधिक लाभकारी बनाता है। इसलिए किसानों को चाहिए कि वे पराली जलाने के बजाय उसे वैज्ञानिक तरीके से मिट्टी में मिलाकर उसका सदुपयोग करें, क्योंकि पराली जलाना नुकसान है, जबकि उसे मिट्टी में मिलाना एक समझदारी भरा निवेश है।



