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युद्ध, जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि: अनदेखा संकट डॉ. अखिलेश कुमार सिंह वरिष्ठ कृषि सलाहकार, छत्तीसगढ़

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राधेश्याम सोनवानी ,गरियाबंद :-युद्ध को प्रायः सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के संदर्भ में देखा जाता है, लेकिन इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष—पर्यावरणीय प्रभाव—अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है। आधुनिक युद्ध अत्यधिक कार्बन-गहन होते हैं। ईंधन की भारी खपत, विस्फोट, आगजनी और पुनर्निर्माण की प्रक्रियाएं मिलकर बड़े पैमाने पर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती हैं। ये उत्सर्जन वैश्विक तापमान को बढ़ाते हैं और जलवायु परिवर्तन की गति को तेज करते हैं। इसका प्रभाव सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया के जलवायु तंत्र को प्रभावित करता है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह एक गंभीर चिंता का विषय है। यहां की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा ग्रामीण उत्पादन से जुड़ा है। ऐसे में जलवायु में थोड़ी भी अस्थिरता सीधे फसल उत्पादन और किसानों की आय को प्रभावित करती है। हाल के वर्षों में मानसून का व्यवहार अधिक अनिश्चित हुआ है—बारिश का समय, मात्रा और वितरण तीनों असंतुलित हो गए हैं। इससे विशेष रूप से वर्षा आधारित कृषि वाले राज्यों—छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश—में जोखिम बढ़ा है।

इसी के साथ, बढ़ती हीटवेव एक नई चुनौती बनकर उभरी है। उत्तर और मध्य भारत में बार-बार पड़ रही लू ने खेती को सीधे प्रभावित किया है। उच्च तापमान के कारण गेहूं और धान जैसी फसलों में दाना भरने की प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे उत्पादन घटता है। मिट्टी की नमी तेजी से कम होने के कारण सिंचाई पर निर्भरता बढ़ती है और जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यह स्थिति छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से कठिन है।

हिमालयी क्षेत्र में भी बदलाव तेजी से दिखाई दे रहे हैं। ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषक ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया को तेज कर रहे हैं, जिससे नदियों के जल प्रवाह में अस्थिरता आ रही है। अल्पकाल में बाढ़ और दीर्घकाल में जल संकट—दोनों स्थितियां कृषि के लिए खतरा हैं, खासकर गंगा के मैदानी क्षेत्रों में, जहां सिंचाई का बड़ा हिस्सा इन नदियों पर निर्भर है।

इस परिदृश्य में समाधान स्पष्ट है—कृषि को अधिक लचीला और जलवायु अनुकूल बनाना। कम पानी में उगने वाली और गर्मी सहन करने वाली फसल किस्मों को बढ़ावा देना, फसल विविधीकरण और मोटे अनाज (मिलेट्स) को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। जल प्रबंधन के क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन और खेत तालाब जैसे उपाय प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं। साथ ही, किसानों को समय पर सटीक मौसम जानकारी और कृषि सलाह उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि वे बदलती परिस्थितियों के अनुसार निर्णय ले सकें।

नीतिगत स्तर पर भी बदलाव की आवश्यकता है। फसल बीमा योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाना, समय पर मुआवजा सुनिश्चित करना और जलवायु अनुकूल कृषि में निवेश बढ़ाना जरूरी है। इसके साथ ही, वैश्विक स्तर पर सभी प्रकार के उत्सर्जनों—विशेषकर युद्ध से जुड़े उत्सर्जनों—को पारदर्शिता के दायरे में लाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अंततः, जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का प्रश्न बन चुका है। युद्ध से उत्पन्न उत्सर्जन इस संकट को और गहरा कर रहे हैं। भारत के लिए यह समय है कि वह कृषि को अधिक टिकाऊ, लचीला और भविष्य के अनुरूप बनाए, ताकि बदलती जलवायु के बीच भी किसानों की आजीविका और देश की खाद्य सुरक्षा सुरक्षित रह सके।

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