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रेप-मर्डर केस में बड़ा फैसला: हाई कोर्ट ने मौत की सजा बदली, कही ये अहम बात

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बिलासपुर: छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने सक्ती के चर्चित दुष्कर्म और हत्या के आरोपी की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल कर दिया है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा, हालांकि अपराध जघन्य था, लेकिन यह रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस नहीं है। प्रतिशोधात्मक न्याय और सुधारात्मक न्याय के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

पढ़िए क्या है मामला?

सक्ती जिले के एक गांव में रहने वाली 25 वर्षीय युवती बेमेतरा फैमिली कोर्ट में चपरासी के पद पर पदस्थ थी। 14 अगस्त 2022 की सुबह अपनी स्कूटी से बेमेतरा जाने के लिए निकली, लेकिन बेमेतरा नहीं पहुंची। जांच के दौरान CCTV फुटेज में दिखा, शंकर निषाद युवती की स्कूटी में पीछे बैठकर उसे पालगाडा घाटी के जंगल की ओर ले जा रहा था। करीब 45 मिनट बाद शंकर अकेले लौटते हुए दिखाई दिया। पुलिस पूछताछ में शंकर ने जुर्म कबूला। उसकी निशानदेही पर पालगाडा घाट के पास जंगल से युवती का शव बरामद किया गया।

निचली अदालत ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा

जांजगीर चांपा की विशेष अदालत ने 16 दिसंबर 2025 को दुष्कर्म और हत्या के मामले में शंकर निषाद को आईपीसी की धारा 364 के तहत अपहरण, धारा 376 के तहत दुष्कर्म और धारा 302 के तहत हत्या का दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। कानून के अनुसार फांसी की सजा पर हाई कोर्ट की मुहर लगना अनिवार्य है।

112 पन्नों में हाई कोर्ट का फैसला

छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने 121 पन्नों के फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने पाया, दोषी का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह युवा है। ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे साबित हो, उसमें सुधार की संभावना नहीं है। हाई कोर्ट ने बच्चन सिंह विरुद्ध पंजाब राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा है, फांसी तभी दी जानी चाहिए जब उम्रकैद का विकल्प पूरी तरह खत्म हो गया हो।

मौत की सजा देने से पहले हाई कोर्ट की पुष्टि अनिवार्य

फांसी की सजा देने से पहले हाई कोर्ट की पुष्टि अनिवार्य है। सीआरपीसी की धारा 366 अब बीएनएसएस धारा 407 के अनुसार जब भी कोई सेशन कोर्ट किसी अपराधी को फांसी की सजा सुनाता है, तो वह सजा तब तक अमल में नहीं लाई जा सकती जब तक हाई कोर्ट उसकी पुष्टि न कर दे। सेशन कोर्ट को मामले की पूरी कार्यवाही और रिकॉर्ड हाई कोर्ट को भेजना होता है। कानूनी भाषा में इसे डेथ रेफरेंस कहा जाता है। हाई कोर्ट केवल सजा की पुष्टि नहीं करता, बल्कि वह पूरे मामले की अदालत की तरह फिर से जांच करता है।

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