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कैसी है संजय दत्त की फिल्म ‘आखिरी सवाल’? डायलॉग में है जान, मिथुन चक्रवर्ती के बेटे ने मारी बाजी

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  • फिल्म रिव्यू:आखिरी सवाल रिव्यू
  • स्टार रेटिंग3/5
  • पर्दे पर:मई 15, 2026
  • डायरेक्टर:अभिजीत मोहन वारंग
  • शैली:पॉलिटिकल ड्रामा

निर्देशक अभिजीत मोहन वारंग की फिल्म ‘आखिरी सवाल’ में संजय दत्त और नमाशी चक्रवर्ती के बीच जबरदस्त बहसबाजी देखने को मिलती है। यह फिल्म दिखावे की झूठी दुनिया और असली देश सेवा के बीच का फर्क दिखाती है और RSS के अनदेखे योगदानों को सामने लाती है। सोशल मीडिया के दौर में भारतीय राजनीति के बारे में आधी अधूरी जानकारी रखने वालों की कमियों को दिखाने की कोशिश बहुत अच्छे तरीके से की गई है। इसमें संजय दत्त द्वारा अभिनीत प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी अपने पूर्व छात्र विक्की हेगड़े (नमाशी चक्रवर्ती) से कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का काम लोगों का भला करना है, आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से जागृत राष्ट्र का निर्माण करना है। संघ का उद्देश्य देश के प्रत्येक नागरिक में अपनी संस्कृति और राष्ट्र के प्रति गर्व की भावना पैदा करना है, न कि किसी को दुख पहुंचाना। आरएसएस जाति, पंथ और वर्ग के भेदभाव को मिटाकर हिंदू समाज को एकजुट करने का प्रयास करता है।

आखिरी सवाल की कहानी

कहानी प्रतिभाशाली, लेकिन गुस्सैल स्वभाव वाले समझदार विक्की हेगड़े के इर्द-गिर्द घूमती है, जो आरएसएस पर अपनी थीसिस के खारिज होने के बाद अपने आदरणीय गुरु प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी पर संस्थागत पक्षपात का सार्वजनिक रूप से आरोप लगाता है। पढ़ाई से जुड़ा एक विवाद धीरे-धीरे राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है और आखिर में लंबी टीवी बहस तक पहुंच जाता है। इस दौरान, सोशल मीडिया पर संघ को लेकर बहस छिड़ जाती है। निर्देशक वारंग और लेखक उत्कर्ष नैथानी ने इस कहानी के जरिए कुछ संवेदनशील ऐतिहासिक मुद्दों को उठाने की कोशिश की है, जिसमें महात्मा गांधी की हत्या, आपातकाल के दौरान RSS की भूमिका, बाबरी मस्जिद विध्वंस, सुनामी के दौरान संगठन का राहत कार्य और केरल के एक RSS कार्यकर्ता की दुखद मृत्यु शामिल है।

आखिरी सवाल के दमदार डायलॉग्स

उत्कर्ष नैथानी की स्क्रिप्ट बहुत ही शानदार है। इसमें RSS के बारे में बनी-बनाई कहानियों और सच्चाई को आसान और भरोसेमंद तरीके से दिखाया गया है। संजय दत्त और नमाशी चक्रवर्ती के डायलॉग सीन के अनुसार एकदम सटीक हैं। हालांकि, इस फिल्म का मकसद उस संगठन के योगदान के बारे में दिखाना है, जिसने अभी-अभी अपने 100 साल पूरे किए हैं फिर भी इसकी पटकथा हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की गहराई में जाकर ऐसे तथ्य सामने लाती है, जिनके बारे में ज्यादातर लोगों को पता नहीं है जैसे कि नटराज की मूर्ति के नीचे बनी बच्चे की आकृति का महत्व और इस्लामी ग्रंथों में मस्जिद बनाने के लिए बताई गई जरूरी बातें। सबकुछ डायलॉग्स के जरिए साधारण तरीके से लोगों को बताने की कोशिश की है।

आखिरी सवाल में किया गया AI का इस्तेमाल

AI से तैयार किया गया फुटेज, जो अतीत को दिखाता है। इस फिल्म की एक और खासियत में से एक है। यह फिल्म इस संगठन के सफर को सिर्फ दिखाने के बजाय, उसके अच्छे काम को भी सामने लाती है। AI का इस्तेमाल बहुत ही शानदार तरीके से किया गया है। मेकर्स ने किसी भी पुराने फुटेज का उपयोग न करते हुए, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया और शानदार विजुअल दिखाने में सफल रहे हैं। फिल्म को हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखते हुए बनाया गया है और हर सीन में बारीकियों को दिखाया है।

आखिरी सवाल स्टार परफॉर्मेंस

यह फिल्म संजय दत्त और नमाशी चक्रवर्ती दोनों की दमदार परफॉर्मेंस पर टिकी है। शुद्ध हिंदी और संस्कृत में डायलॉग बोलते संजय दत्त ने कमाल कर दिया हैं। वहीं, नमाशी ने विक्की हेगड़े के किरदार में बेहतरीन काम किया है। वह एक होनहार स्टूडेंट है, जिसका इरादा और लक्ष्य एकदम साफ है। वह पूरी फिल्म में अपने किरदार को बखूबी निभाते हैं।

अमित साध ने आदित्य राव के छोटे से रोल में एक बार फिर जबरदस्त परफॉर्मेंस दी है। समीरा रेड्डी ने डॉ. पल्लवी के रोल में निराश कर दिया है। उनके चेहरे के हाव-भाव बनावटी लग रह थे।

सारा के रोल में त्रिधा चौधरी और काव्या के रोल में नीतू चंद्रा के रोल बस सजावटी हैं। इससे ज्यादा कुछ नहीं लगा। प्रोफेसर की पत्नी के छोटे से रोल में मृणाल कुलकर्णी का काम बहुत अच्छा था। कॉलेज चीफ के रोल में बिपिन नाडकर्णी ने ठीक-ठाक काम किया हैं, लेकिन इपशिता के रोल में हरसिमरन ओबेरॉय और सोहराब के रोल में रॉकी रैना का काम अच्छा रहा।

आखिरी सवाल डायरेक्शन

इसकी स्क्रिप्ट इतनी कसी हुई लिखी गई है कि डायरेक्टर अभिजीत मोहन वारंग का काम आसान हो गया। फिर भी फिल्म को बेहतरीन ढंग से गढ़ने और एडिट करने का श्रेय उन्हें ही मिलना चाहिए। 117 मिनट की फिल्म में वारंग ने फालतू के सीन्स नहीं दिखाए और पूरी फिल्म में खासकर दूसरे अहम हिस्से में कहानी को दिलचस्प बनाए रखा है। फिल्म का क्लाइमेक्स सचमुच बेमिसाल है, जिसमें तथ्यों के आधार पर बहस हुई।

आखिरी सवाल म्यूजिक

म्यूजिक की बात करें तो मोंटी शर्मा का बैकग्राउंड स्कोर काफी अच्छा लगा। एक गाना जो दर्शकों पर अपनी गहरी छाप छोड़ता है, वह है फिल्म के आखिर में बजने वाला गाना ‘है प्रीत जहां की रीत सदा’ है, जिसके बोल इंदीवर ने लिखे थे।

आखिरी सवाल कैसी है

यह फिल्म इसलिए देखी जानी चाहिए क्योंकि यह जिस सच्चाई को सामने लाती है, वह देखने लायक है। अंत में आने वाला मोड़ जबरदस्त है और कहानी कहने का अंदाज भी अनोखा है। ऐसे में आप ये फिल्म एक बार जरूर देख सकते हैं। जो लोग भारत के इतिहास से जुड़ी फिल्में देखना पसंद करते हैं, उनके लिए ‘आखिरी सवाल’ देखने लायक है, जिसमें कई मुद्दों को दिखाया गया है।

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