असम के गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत पर स्थित है कामाख्या देवी मंदिर. ये मंदिर 51 शक्तिपीठों में शामिल है. धार्मिक और पौराणिक मान्यता है कि इस जगह पर देवी सती का योगी भाग गिरा था. यहां किसी प्रतिमा की पूजा नहीं की जाती है, बल्कि गर्भ गृह में योनि आकार की शिला पूजी जाती जाती है, जिससे जल बहता रहता है. भक्त योनि आकार की शिला और बहते जल को स्पर्श करके मां का आशीर्वाद लेते हैं. ये देश का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां देवी रजस्वला होती हैं. यानी उनका मासिक धर्म का चक्र शुरू होता है. इस दौरान मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. इसी समय पर मंदिर के बाहर अंबुबाची मेला लगता है. कल यानी 22 जून से अंबुबाची मेले की शुरुआत होगी. इस मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. कल रात को रात 9 बजकर 8 मिनट 42 सेकंड पर प्रवृत्ति अनुष्ठान होगा और मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएंगे.
देवी के आराम का समय:- इसके बाद 26 तारीख को सुबह नियमित पूजा (निवृत्ति’) होगी. पूजा के बाद मंदिर के कपाट फिर से खोल दिए जाएंगे. अंबुबाची मेला प्रारंभ होने से पहले मंदिर में पुजारी इस शिला के पास सफेद अंगवस्त्र रख दिया करते हैं. इसके बाद मंदिर बंद कर दिया जाता है. मान्यता है कि ये समय देवी के आराम का होता है और सृष्टि फिर से नई ऊर्जा प्राप्त करती है. इस दौरान ब्रह्मपुत्र नदी का जल भी लाल हो जाता है.
प्रसाद में मिलता है अंगोदक वस्त्र:- जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, तो शिला के पास रखा गया सफेद अंगवस्त्र लाल मिलता है. इसे अंबुबाची वस्त्र या अंगोदक वस्त्र कहा जाता है. यही यहां आए भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है. अंबुबाची मेले में देश-दुनिया के श्रद्धालुओं के साथ-साथ साधु-संत, तांत्रिक आदि भी पहुंचते हैं और साधना करते हैं. मान्यता है कि इस अवधि में की गई साधना से बुहत लाभ मिलता है. अंबुबाची मेले को धार्मिक आयोजन के साथ-साथ शक्ति, आस्था और प्रकृति के सम्मान का अद्भुत संगम माना जाता है.



