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घटती जोत, बढ़ती जिम्मेदारी: क्या बच्चों को प्रकृति और खेती से जोड़ने का समय आ गया है?

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राधेश्याम सोनवानी, गरियाबंद :- डॉ. अखिलेश कुमार सिंह वरिष्ठ कृषि सलाहकार | जलवायु परिवर्तन एवं कार्बन क्रेडिट विशेषज्ञ छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। यहाँ की मिट्टी, नदियाँ, जंगल और खेत केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और जीवन का आधार हैं। राज्य की बड़ी आबादी आज भी कृषि, वनोपज और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। लेकिन इस कृषि प्रधान राज्य के सामने एक ऐसी चुनौती धीरे-धीरे आकार ले रही है, जिस पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो रही है।

यह चुनौती है—लगातार सिकुड़ती कृषि जोत (Land Holding)।
हर पीढ़ी के साथ परिवार बढ़ते हैं और पुश्तैनी भूमि का बंटवारा होता जाता है। जो खेत कभी पूरे परिवार का भरण-पोषण करते थे, वही खेत आज छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट चुके हैं। आने वाले वर्षों में यह स्थिति और गंभीर होगी। छोटे किसानों के लिए खेती की लागत बढ़ती जाएगी, आधुनिक तकनीक अपनाना कठिन होगा, सिंचाई पर निवेश सीमित होगा और कृषि से मिलने वाली आय लगातार कम होती जाएगी।यह केवल भूमि का बंटवारा नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संरचना में हो रहा एक बड़ा परिवर्तन है। दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान, भूजल का गिरता स्तर, मिट्टी की घटती उर्वरता और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव कृषि को पहले से अधिक असुरक्षित बना रहे हैं।

अब प्रश्न यह है कि क्या केवल नई तकनीक, बेहतर बीज और सरकारी योजनाएँ इस समस्या का स्थायी समाधान हैं? मेरा मानना है कि इसका उत्तर केवल तकनीक में नहीं, बल्कि शिक्षा में छिपा है। आज जो बच्चे विद्यालयों में पढ़ रहे हैं, वही कल इन खेतों के उत्तराधिकारी होंगे। लेकिन क्या हम उन्हें भविष्य की कृषि के लिए तैयार कर रहे हैं? क्या उन्हें यह बताया जा रहा है कि मिट्टी केवल धूल नहीं, बल्कि जीवित संसाधन है?
क्या वे जानते हैं कि एक इंच उपजाऊ मिट्टी बनने में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं? क्या उन्हें यह सिखाया जा रहा है कि वर्षा जल का संरक्षण कैसे किया जाए, जैव विविधता क्यों आवश्यक है, वृक्ष केवल ऑक्सीजन ही नहीं बल्कि मिट्टी और जल संरक्षण का भी आधार हैं? दुर्भाग्य से हमारे विद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा अधिकांशतः पुस्तकों तक सीमित रह गई है। बच्चों को परीक्षा के लिए उत्तर याद कराए जाते हैं, लेकिन प्रकृति के साथ जीना नहीं सिखाया जाता।

यदि हमें भविष्य की कृषि को सुरक्षित बनाना है, तो हमें विद्यालयों में कृषि एवं पर्यावरण आधारित व्यावहारिक शिक्षा को अनिवार्य बनाना होगा। कल्पना कीजिए कि यदि प्रत्येक विद्यालय में एक छोटा जैविक उद्यान हो, जहाँ बच्चे स्वयं सब्जियाँ उगाएँ।यदि प्रत्येक छात्र वर्षा जल संचयन का मॉडल बनाए।यदि प्रत्येक विद्यालय कम्पोस्ट खाद तैयार करे। यदि प्रत्येक बच्चा कम से कम एक वृक्ष लगाए और उसकी देखभाल करना सीखे।
यदि बच्चों को यह समझाया जाए कि मिट्टी में कार्बन बढ़ाने से केवल उत्पादन ही नहीं बढ़ता, बल्कि जलवायु परिवर्तन की गति भी धीमी की जा सकती है।

यदि उन्हें बताया जाए कि भविष्य में कार्बन क्रेडिट, जैविक खेती, एग्रोफॉरेस्ट्री, बायोचार, प्राकृतिक खेती, डिजिटल कृषि और जल संरक्षण केवल वैज्ञानिक शब्द नहीं होंगे, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने के महत्वपूर्ण साधन बनेंगे।ऐसी शिक्षा बच्चों को केवल अच्छे विद्यार्थी नहीं बनाएगी, बल्कि जिम्मेदार नागरिक भी बनाएगी। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह विषय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। राज्य के पास विशाल वन क्षेत्र, समृद्ध जैव विविधता, आदिवासी समुदायों का पारंपरिक ज्ञान तथा प्राकृतिक संसाधनों की अपार संभावनाएँ हैं। यदि इन संसाधनों का वैज्ञानिक और टिकाऊ उपयोग किया जाए, तो कृषि उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका—तीनों को एक साथ मजबूत किया जा सकता है।आज राज्य में जल संरक्षण, वॉटरशेड विकास, नरवा-गरवा-घुरवा-बाड़ी, मिलेट मिशन, कृषि वानिकी, स्वयं सहायता समूहों तथा किसान उत्पादक संगठनों के माध्यम से अनेक सराहनीय प्रयास किए जा रहे हैं। यदि इन प्रयासों को विद्यालयी शिक्षा से जोड़ा जाए, तो इनका प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है।

यह केवल कृषि विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। यह शिक्षा विभाग, पंचायतों, कृषि विश्वविद्यालयों, स्वयं सहायता समूहों, अभिभावकों, शिक्षकों और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि भविष्य का किसान केवल हल चलाने वाला व्यक्ति नहीं होगा। वह जलवायु परिवर्तन को समझने वाला, तकनीक का उपयोग करने वाला, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधक, उद्यमी और पर्यावरण का संरक्षक होगा।
यदि हम आज अपने बच्चों को प्रकृति से जोड़ देंगे, तो कल वे अपनी छोटी-सी भूमि पर भी अधिक उत्पादन, बेहतर आय और टिकाऊ कृषि का मॉडल प्रस्तुत कर सकेंगे। हम अक्सर कहते हैं कि बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करना चाहिए। लेकिन भविष्य केवल इंजीनियर, डॉक्टर या अधिकारी बनने का नहीं है। भविष्य उस पीढ़ी का है जिसे कम भूमि, सीमित जल और बदलती जलवायु के बीच पूरे समाज की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। इसलिए समय आ गया है कि हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय जोड़ें—पर्यावरण एवं कृषि साक्षरता।

क्योंकि भविष्य की सबसे बड़ी पूँजी बड़ी जोत नहीं होगी।
सबसे बड़ी पूँजी होगी—वह शिक्षित और जागरूक पीढ़ी, जो अपनी विरासत में मिली हर इंच भूमि का सम्मान करना और उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना जानती हो। आज हम बच्चों के मन में जो बीज बोएँगे, वही कल छत्तीसगढ़ के खेतों में हरियाली, समृद्धि और पर्यावरणीय संतुलन के रूप में फलेंगे-फूलेंगे।

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