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सतयुग द्वापर, त्रेता और कलयुग… जगन्नाथ मंदिर के दरवाजों का है 4 युगों से संबंध…

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हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा निकाली जाती है. उनके साथ बड़े भाई बलभद्र और सुभद्रा जी के रथ भी होते हैं. ये ओडिशा के पवान और मुख्य पर्वों में से एक है. रथयात्रा के दौरान पुरी स्थित जगन्नाथ जी के मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. इस साल ये पावन रथयात्रा 16 जुलाई को निकाली जाएगी. इस दौरान भगवान अपनी मौसी गुंडिचा देवी के मंदिर जाएंगे.धार्मिक मान्यता है कि रथयात्रा के दौरान रथों की रस्सियां खींचने से जाने अनजाने में किए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. साथ ही मोक्ष की प्राप्ति होती है. जगन्नाथ रथयात्रा धार्मिक के साथ साथ भक्त और भगवान के मिलन का भी पर्व माना जाता है. भगवान के मंदिर में उनकी प्रतिमा से लेकर मंदिर के दरवाजों तक में रहस्य छिपे हुए हैं. मंदिर के चार दरवाजें हैं, जिनका संबंध चार युगों से बताया जाता है.

सिंह द्वार:- सबसे पहले बात करते हैं मंदिर के पूर्व दिशा के द्वार की. इसको सिंह द्वार कहा जाता है. यह मंदिर का मुख्य द्वार है और इसे मोक्ष का प्रतीक बताया जाता है. मान्यता है कि भक्त जब इस द्वार से प्रवेश करते हैं, तो उनकी आत्मा पावन हो जाती है. इस द्वार के सामने प्रसिद्ध अरुण स्तंभ है. इस पर भगवान सूर्य के सारथी अरुण देव की मूर्ति है. मान्यता है कि इसको देखने से शुभ फल प्राप्त होते हैं.

अश्व द्वार:- मंदिर के दूसरे द्वार को अश्व द्वार या विजय द्वार कहते हैं. प्राचीन काल में युद्ध पर जाने वाले राजा इसी दरवाजे मंदिर में आते थे और भगवान जगन्नाथ से विजय की कामना करते थे. इसीलिए इसे विजय का प्रतीक माना माना जाता है. मंदिर का ये दूसरा द्वार दक्षिण दिशा में है.

हस्ति द्वार:- मंदिर का तीसरा द्वार है हस्ति द्वार. यानी हाथी द्वार. यह द्वार समृद्धि और सुख का प्रतीक माना जाता है. इस द्वार पर भगवान गणेश की मूर्ति विराजमान है. इस द्वार से प्रवेश करने पर जीवन में धन, ज्ञान और सौभाग्य की प्राप्ति होने की मान्यता है. मंदिर का ये द्वार पश्चिम दिशा में है.

व्याघ्र द्वार:- मंदिर का चौथा दवराजा है व्याघ्र द्वार, जिसे बाघ द्वार भी कहते हैं. ये द्वार मंदिर के उत्तर दिशा में स्थित है. ये भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित किया गया है. यह द्वार धर्म और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है.

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