नेटफ्लिक्स पर जब कोई सस्पेंस थ्रिलर या लीगल ड्रामा दस्तक देता है, तब रिमोट उठाने से पहले दिल में एक एक्साइटमेंट होती है कि कुछ नया और धमाकेदार देखने को मिलेगा. लेकिन फिल्म ‘इक्का’ को देखने के बाद वो सारी एक्साइटमेंट ठंडी पड़ जाती है. महाराज जैसी दमदार फिल्म बनाने वाले डायरेक्टर सिद्धार्थ पी मल्होत्रा ने एक ऐसी फिल्म बनाई है जो खुद को सस्पेंस का किंग मानती है, लेकिन इसके सारे पत्ते पहले पंद्रह मिनट में ही खुल जाते हैं. फिल्म में सनी देओल की दहाड़ और अक्षय खन्ना का पुराना विलेन वाला स्वैग तो है, पर कहानी में वो दम ही नहीं है जो आपको बांधकर रख सके. अगर वन-लाइन में अपना फाइनल फैसला सुनाएं, तो ‘इक्का’ पूरी तरह से पिटा हुआ पत्ता है, जिसके झांसे में आकर अगर आपने रिमोट उठा लिया, तो फिल्म खत्म होने के बाद आप सिर्फ अपना कीमती समय और वीकेंड का डेटा वापस मांगेंगे.
कैसी है फिल्म:- ‘इक्का’ की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसकी स्क्रिप्ट लिखने वाली टीम ने दर्शकों को बिल्कुल नासमझ मान लिया है. फिल्म के आखिरी एक घंटे में मेकर्स आपको चौंकाने के लिए इतने सारे ‘ट्विस्ट और टर्न’ फेंक-फेंक कर मारते हैं कि आपका सिर चकरा जाए. स्क्रीनप्ले बार-बार चीखकर कहता है,”जो देख रहे हो, उस पर शक करो!” लेकिन असली मजे की बात ये है कि जो ट्विस्ट क्लाइमेक्स में आने वाला होता है, वो दर्शक को एक मील दूर से ही साफ-साफ दिख रहा होता है. मेकर्स जिसे मास्टरस्ट्रोक समझकर परदे पर उतार रहे थे, वो सोशल मीडिया के जमाने में एक साधारण सा जोक बनकर रह गया है.
डायरेक्शन:- डायरेक्टर सिद्धार्थ पी मल्होत्रा का डायरेक्शन देखकर ऐसा लगता है कि वो खुद कन्फ्यूज थे कि वो सनी देओल की ‘दामिनी’ का पार्ट-2 बना रहे हैं या फिर आज के जमाने का कोई थ्रिलर. उन्होंने फिल्म के विजुअल्स तो अच्छे रखे हैं, लेकिन कहानी को कसने में उनका हाथ पूरी तरह ढीला रहा. खासकर जो इमोशनल सीन्स हैं, जहां लड़की की मां (ज्योति मुखर्जी) अर्जुन के सामने रोती है कि औलाद को खोने से बड़ा कोई दर्द नहीं होता. ये सीन्स इतने पुराने मिजाज के लगते हैं कि दर्शकों का दिल पिघलने के बजाय वो बोर होने लगते हैं. डायरेक्शन का पूरा ढांचा इतना लाउड है कि कोर्टरूम कम और मछली बाजार ज्यादा महसूस होता है.



