एक शिक्षिका बिना आवेदन दिए स्कूल से हुई रवाना, दूसरी पहुंची देरी से; मुख्यालय में निवास नहीं करने का भी आरोप, खामियाजा भुगत रहे ग्रामीण विद्यार्थी

छुरिया : विकासखंड छुरिया अंतर्गत शासकीय प्राथमिक शाला लालूटोला में शनिवार को शिक्षकों की कथित मनमानी और लापरवाही का गंभीर मामला सामने आया है। मिली जानकारी अनुसार विद्यालय में रखी पुरानी सरकारी पुस्तकों को बेचने के लिए बाकायदा कबाड़ी की गाड़ी स्कूल परिसर में बुलवाई गई और पुस्तकों को वाहन में लोड कराकर बाहर भेज दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम के फोटो और वीडियो भी मौजूद हैं। मामला सामने आने के बाद सरकारी शैक्षणिक सामग्री के निस्तारण, विद्यालय प्रबंधन की जवाबदेही और शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल यह है कि सरकारी पुस्तकें आखिर किसकी अनुमति से कबाड़ी को बेची गईं? कबाड़ी की गाड़ी किसने बुलवाई? कितनी रकम में सौदा हुआ और बिक्री से मिली राशि आखिर कहां गई?
फोटो-वीडियो मौजूद, अब सवाल—किसकी अनुमति से बेची गईं सरकारी पुस्तकें?
जानकारी के अनुसार, प्राथमिक शाला लालूटोला में रखी पुरानी सरकारी पुस्तकों को कबाड़ी वाहन में लोड कराकर विद्यालय से बाहर भेजा गया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन सरकारी पुस्तकों को बेचने के लिए सक्षम अधिकारी से पूर्व अनुमति ली गई थी? क्या पुस्तकों को नियमानुसार अनुपयोगी घोषित किया गया था? क्या उनकी सूची तैयार की गई? क्या कोई पंचनामा बनाया गया और क्या निर्धारित विभागीय प्रक्रिया का पालन किया गया?
यदि सरकारी पुस्तकें बेची गई हैं, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कुल कितनी पुस्तकें बेची गईं, उनका वजन कितना था, किस दर पर सौदा हुआ, बिक्री से कितनी राशि प्राप्त हुई और वह राशि किसके पास गई या कहां जमा की गई?फोटो-वीडियो सामने आने के बाद अब मामला केवल मौखिक आरोपों तक सीमित नहीं रह गया है। शिक्षा विभाग को उपलब्ध साक्ष्यों और विद्यालय के सरकारी अभिलेखों की निष्पक्ष जांच कर वास्तविकता सामने लानी चाहिए।
बेचने वाली शिक्षिका और खरीदने वाले कबाड़ी पर होगी एफआईआर या नहीं?
अब इस मामले में एक बड़ा और गंभीर सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि सरकारी पुस्तकों को बिना सक्षम अनुमति और निर्धारित प्रक्रिया के बेचा गया, तो क्या पुस्तकें बेचने के लिए जिम्मेदार शिक्षिका के खिलाफ विभाग पुलिस में शिकायत देकर एफआईआर दर्ज कराएगा?इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि सरकारी पुस्तकें खरीदने वाले कबाड़ी की भूमिका की जांच होगी या नहीं? क्या कबाड़ी को यह जानकारी थी कि जो पुस्तकें वह खरीद रहा है, वे सरकारी विद्यालय की सामग्री हैं? क्या पुस्तकों को वापस बरामद किया जाएगा? क्या कबाड़ी से पूछताछ होगी और लेन-देन का पूरा हिसाब सामने लाया जाएगा?
हालांकि, शिक्षिका या कबाड़ी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी या नहीं, इसका अंतिम निर्णय जांच में सामने आए तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर संबंधित विभाग और पुलिस द्वारा किया जाएगा। लेकिन फोटो-वीडियो मौजूद होने के बाद निष्पक्ष जांच की मांग को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
कबाड़ी की गाड़ी किसने बुलाई, कितने में हुआ सौदा?
मामले में सवालों की लंबी फेहरिस्त है। कबाड़ी की गाड़ी किसके निर्देश पर विद्यालय पहुंची? सरकारी पुस्तकें बेचने का फैसला किसने लिया? क्या खंड शिक्षा अधिकारी अथवा किसी अन्य सक्षम अधिकारी से लिखित अनुमति ली गई थी? क्या स्कूल प्रबंधन समिति को इसकी जानकारी थी? क्या एसएमसी की बैठक में इस संबंध में कोई प्रस्ताव पारित किया गया था?
यदि सरकारी पुस्तकों को बिना सक्षम अनुमति और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बेचा गया है, तो मामला गंभीर प्रशासनिक एवं वित्तीय अनियमितता का विषय हो सकता है। ऐसे में जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई किया जाना जरूरी होगा।
शनिवार को एक शिक्षिका बिना आवेदन स्कूल से गई, दूसरी पहुंची देरी से
मामला केवल सरकारी पुस्तकों की कथित बिक्री तक सीमित नहीं है। आरोप है कि शनिवार को विद्यालय की एक शिक्षिका बिना कोई लिखित आवेदन दिए स्कूल से चली गई, जबकि दूसरी शिक्षिका निर्धारित समय से देरी से विद्यालय पहुंची।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब शिक्षक ही विद्यालयीन समय और अनुशासन का पालन नहीं करेंगे, तो बच्चों की नियमित पढ़ाई और विद्यालय की व्यवस्था आखिर किसके भरोसे चलेगी?
विद्यालय की उपस्थिति पंजी, अवकाश आवेदन, आगमन-प्रस्थान का वास्तविक समय और अन्य संबंधित अभिलेखों की जांच से इस आरोप की वास्तविकता आसानी से स्पष्ट की जा सकती है।
मुख्यालय में नहीं रहती शिक्षिका? देरी का खामियाजा भुगत रहे ग्रामीण विद्यार्थी
देर से विद्यालय पहुंचने वाली शिक्षिका को लेकर एक और गंभीर आरोप सामने आया है। आरोप है कि संबंधित शिक्षिका निर्धारित मुख्यालय में निवास नहीं करतीं, जिसके कारण विद्यालय पहुंचने में देरी होती है और इसका सीधा खामियाजा ग्रामीण विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है।
ग्रामीण अभिभावक अपने बच्चों को समय पर तैयार कर विद्यालय भेजते हैं। ऐसे में यदि शिक्षक ही समय पर विद्यालय नहीं पहुंचें तो बच्चों की पढ़ाई के नुकसान की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?सवाल यह भी है कि क्या संबंधित शिक्षिका के मुख्यालय निवास और नियमित आगमन समय की कभी जांच की गई? क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने विद्यालय का औचक निरीक्षण किया? यदि शिक्षिका लगातार देर से पहुंचती हैं, तो अब तक विभाग ने क्या कार्रवाई की?
अब शिक्षा विभाग की कार्रवाई पर नजर—एफआईआर होगी या केवल स्पष्टीकरण?
अब बड़ा सवाल यह है कि फोटो-वीडियो सामने आने के बाद शिक्षा विभाग क्या कार्रवाई करता है? क्या विकासखंड शिक्षा अधिकारी तत्काल विद्यालय पहुंचकर जांच करेंगे? क्या संबंधित सरकारी अभिलेखों को सुरक्षित कर उनकी पड़ताल की जाएगी? क्या जिम्मेदार शिक्षकों से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा? और यदि बिना अनुमति सरकारी पुस्तकें बेचना प्रमाणित हुआ, तो क्या विभाग पुलिस में शिकायत देकर एफआईआर दर्ज कराएगा?
इसके साथ ही बिना आवेदन स्कूल छोड़ने, देर से पहुंचने और मुख्यालय में निवास नहीं करने के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है।अब सबसे बड़े सवाल शिक्षा विभाग के सामने हैं—प्राथमिक शाला लालूटोला में कबाड़ी की गाड़ी किसने बुलवाई? पुरानी सरकारी पुस्तकें किसकी अनुमति से बेची गईं? बिक्री से कितनी रकम मिली और वह रकम कहां गई? सरकारी पुस्तकें बेचने के लिए जिम्मेदार शिक्षिका और उन्हें खरीदने वाले कबाड़ी पर एफआईआर होगी या नहीं? और देर से आने तथा मुख्यालय में निवास नहीं करने के कारण यदि ग्रामीण विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, तो आखिर इसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?फोटो-वीडियो मौजूद हैं, इसलिए अब निगाहें शिक्षा विभाग की जांच और कार्रवाई पर टिकी हैं।
प्रशांत कुमार चिर्वतकर विकासखंड शिक्षा अधिकारी, छुरिया ने कहा कि मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित शिक्षकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। जवाब प्राप्त होने के बाद तथ्यों के आधार पर नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी



