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हिंदू शादी में क्यों निभाई जाती है पाणिग्रहण की रस्म? जानिए इसका गहरा धार्मिक और वैदिक महत्व

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वैदिक परंपरा के सोलह ‘संस्कारों’ में से खास माना जाता है विवाह संस्कार, जिसका हिंदू धर्म में बहुत ज्यादा महत्व है। इसी वजह से हिंदू शादियों की सभी रस्में बहुत जरूरी मानी जाती हैं। शादी की रस्मों में न केवल दूल्हा-दुल्हन को एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान दिखाने की सीख दी जाती है बल्कि कई रीति-रिवाज उनके रिश्ते को मजबूत बनाते हैं। शादी की शुरुआत जहां रोका और गोदभराई से होती हैं, वहीं इस दौरान सातफेरे, कन्यादान, सिंदूरदान और पाणिग्रहण की परंपरा निभाई जाती है।

इन सभी में पाणिग्रहण संस्कार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और ये दूल्हे-दुल्हन के कई जन्मों तक साथ निभाने की भावना का प्रतीक होती है। आइए आपको बताते हैं क्या है शादी में निभाए जाने वाले इस संस्कार का महत्व और यह परंपरा कैसे निभाई जाती है?

पाणिग्रहण संस्कार क्या है ?
पाणिग्रहण का अर्थ होता है ‘पाणि’ यानी कि हाथ और ‘ग्रहण’ यानी कि थामना या स्वीकार करना। शादी की इस रस्म में दुल्हन दूल्हे के दाहिने हाथ की तरफ बैठती है और दूल्हे का दाहिना हाथ दुल्हन के दाहिने हाथ में दिया जाता है। दूल्हा एक भरोसे और सहयोग के प्रतीक के रूप में पर दुल्हन हाथ थामता है और उसे अपनी पत्नी का दर्जा देकर हमेशा खुश रखने का वचन देता है। इसके बाद दूल्हा-दुल्हन अग्नि के चारों ओर फेरा लगाते हैं और अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो जाते हैं। दूल्हा एक मंत्र का उच्चारण करता है जो काव्यात्मक भाषा में उनके रिश्ते को परिभाषित करता है।

पाणिग्रहण संस्कार कैसे किया जाता है?
हिंदू शादी में, सबसे पहले दुल्हन के पिता उसका हाथ होने वाले दूल्हे को सौंपते हैं और उससे विवाह की अनुमति लेते हैं। इसके बाद दूल्हा अपनी दाहिनी हथेली को नीचे लाकर दुल्हन के दाहिने हाथ को अपनी हथेली से ढक लेता है।

‘पाणिग्रहण’ की इस रस्म के दौरान वह अपनी दाहिनी हथेली से दुल्हन के दाहिने हाथ की सभी पांचों उंगलियों को ढंक लेता है। दुल्हन का हाथ पकड़े हुए दूल्हा वैवाहिक जीवन में लंबी उम्र, संतान, समृद्धि और आपसी तालमेल के लिए प्रार्थना करता है।

‘पाणिग्रहण’ की रस्म इस बात का प्रतीक है कि शादी के मौके पर दुल्हन अपना सर्वस्व दूल्हे के हाथों में सौंप रही है। यह एक वैदिक रस्म भी है, जिसमें दूल्हा वादा करता है कि वह उसका हाथ थामेगा और वैवाहिक जीवन में उसे सदैव सुरक्षित रखेगा।

पाणिग्रहण संस्कार का मंत्र
ऋग्वेद के विवाह सूक्त में हिंदू विवाह की कई रस्मों के बारे में बताया गया है और कुछ मंत्रों का वर्णन भी मिलता है जो शादियों को संपूर्ण करते हैं। ऐसा ही एक मंत्र है जिसका उच्चारण पाणिग्रहण संस्कार के समय दूल्हे द्वारा किया जाता है-

गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः।
भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः॥

इस मंत्र का अर्थ है-

हे सौभाग्यशालिनी वधू! मैं तुम्हें अपनी जीवनसंगिनी बनाने के लिए तुम्हारा हाथ थामता हूं, जिससे तुम मेरे साथ वृद्धावस्था तक रहो। भग, अर्यमा, सविता और पुरंधि (देवताओं) ने तुम्हें मुझे सौंपा है, जिससे तुम मेरे गृहस्थ धर्म को सफल बनाओ।

वास्तव में पाणिग्रहण संस्कार विवाह की पूर्णता का प्रतीक है। यह हिंदू शादी की रस्मों से एक है जो वर और वधू को अटूट बंधन में बांधकर जन्म जन्मांतर तक साथ निभाने की प्रेरणा देती है।

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