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इलाज के नाम पर कौन खेल रहा है खेल? झोलाछापों से लेकर सरकारी व्यवस्था तक सवाल?

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लिखित शिकायत के बाद भी कार्यवाही करने में क्यों फूल रहे अधिकारियों के हाथ – पैर

अनीता गर्ग अमन पथ ब्यूरो चीफ रायगढ़ : जिला रायगढ़ वनांचल की मजबूरी का फायदा उठाने के आरोप; डूमरमुड़ा, बाचाडोला, कोड़तराई और बोजिया से सामने आई शिकायतें, स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर उठे सवाल?

छत्तीसगढ़ एक बड़ा वनांचल राज्य है। दूर-दराज के गांवों और वन क्षेत्रों में रहने वाले गरीब ग्रामीणों के सामने आज भी सबसे बड़ी चुनौती समय पर स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंचना है। कई गांवों से सरकारी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र की दूरी अधिक है, आवागमन की सुविधा सीमित है और अचानक बीमारी होने पर ग्रामीण के पास तत्काल स्थानीय स्तर पर इलाज कराने के अलावा कोई आसान विकल्प नहीं बचता। यही मजबूरी कथित झोलाछापों के लिए अवसर बनती जा रही है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार रायगढ़ जिले के कई ग्रामीण इलाकों में ऐसे लोग सक्रिय हैं, जो बिना उचित चिकित्सकीय जांच के मरीजों को दवा, इंजेक्शन और ड्रिप देने का काम कर रहे हैं। ग्रामीणों की मजबूरी का फायदा उठाकर इलाज करने के आरोपों के बीच सवाल यह है कि आखिर स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था इन गतिविधियों पर कितनी प्रभावी है?

डूमरमुड़ा में घर बना इलाज का ठिकाना

प्राप्त जानकारी के अनुसार डूमरमुड़ा गांव में घर को ही कथित तौर पर इलाज के लिए इस्तेमाल किए जाने की शिकायत सामने आई है। यहां मरीजों को घर पर दवा देने के साथ ड्रिप और इंजेक्शन लगाए जाने की बात कही जा रही है। यदि बिना आवश्यक योग्यता और अनुमति के ऐसा उपचार किया जा रहा है तो यह गंभीर मामला है, जिसकी विभागीय जांच जरूरी है।

बाचाडोला में ‘बंगाली डॉक्टर’ की चर्चा

बाचाडोला गांव में कथित रूप से ‘बंगाली डॉक्टर’ के नाम से इलाज किए जाने की जानकारी सामने आई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार मरीज से बीमारी पूछकर दवा देने की शिकायत है। ऐसे में संबंधित व्यक्ति की चिकित्सकीय योग्यता, पंजीयन और इलाज करने की वैधानिक स्थिति की जांच स्वास्थ्य विभाग को करनी चाहिए।

कोड़तराई में डिग्री पर सवाल

कोड़तराई में भी कथित रूप से बिना उचित जांच के दवा देने की शिकायत सामने आई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इलाज करने वाले व्यक्ति की डिग्री और पंजीयन को लेकर ग्रामीणों को स्पष्ट जानकारी नहीं है। बीमारी पूछकर सीधे दवा देना यदि जांच में सही पाया जाता है तो मरीजों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम हो सकता है।

बोजिया में स्वास्थ्य विभाग के सुपरवाइजर पर घर में इलाज का आरोप

बोजिया गांव का मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि प्राप्त जानकारी के अनुसार लालजी राठौर स्वास्थ्य विभाग में सुपरवाइजर के पद पर पदस्थ हैं, लेकिन उनके द्वारा घर पर ही मरीजों का इलाज किए जाने की शिकायत सामने आई है।

शिकायतकर्ता द्वारा वीडियो साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने की बात कही गई है। शिकायतकर्ता के अनुसार वीडियो में लालजी राठौर के घर से दवा लेकर निकलती महिला और एक बच्चे के रोने की आवाज स्पष्ट रूप से सुनाई देती है। इन आरोपों और वीडियो की वास्तविकता की पुष्टि सक्षम जांच के बाद ही हो सकती है, लेकिन यदि विभाग के सामने साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।

वीडियो के बाद भी केवल स्पष्टीकरण क्यों?

प्राप्त जानकारी के अनुसार शिकायत के बाद संबंधित स्वास्थ्य कर्मी से स्पष्टीकरण लेकर मामले का निराकरण कर दिया गया। सवाल यह है कि क्या केवल स्पष्टीकरण पर्याप्त है? यदि शिकायतकर्ता ने वीडियो साक्ष्य दिए हैं तो उनकी तकनीकी जांच, संबंधित मरीजों की पहचान और बयान तथा घर पर उपचार की वास्तविक स्थिति की जांच भी होनी चाहिए।

यदि आरोप गलत हैं तो जांच के बाद शिकायत को निराधार साबित किया जा सकता है, लेकिन यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो नियम के अनुसार कार्रवाई भी जरूरी है। यही पारदर्शी व्यवस्था जनता का भरोसा बनाए रख सकती है।

वनांचल की मजबूरी, झोलाछापों का फायदा

छत्तीसगढ़ के वनांचल और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा की वास्तविक चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई गरीब परिवारों के लिए जिला अस्पताल तक पहुंचना समय और पैसे दोनों के लिहाज से कठिन होता है। ऐसे में गांव में ही उपलब्ध व्यक्ति को वे डॉक्टर समझकर उसके पास चले जाते हैं।

यही मजबूरी कथित झोलाछापों के लिए कमाई का माध्यम बनती जा रही है। प्राप्त शिकायतों के अनुसार कहीं सामान्य दवा के नाम पर करीब 50 रुपये लिए जाते हैं तो तेज बुखार या कमजोरी जैसी स्थिति में इंजेक्शन और ड्रिप के लिए करीब 1000 रुपये तक मांगे जाने की बात सामने आती है। इन दावों का आधिकारिक सत्यापन आवश्यक है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग को ऐसे मामलों की जमीनी जांच जरूर करनी चाहिए।

‘तुरंत इलाज’ या जिंदगी के साथ जोखिम?

कुछ स्थानीय नेताओं द्वारा कथित रूप से यह तर्क दिया जाता है कि गांव में झोलाछाप डॉक्टर जरूरी हैं, क्योंकि वे तत्काल इलाज उपलब्ध करा देते हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर यही ‘तुरंत इलाज’ किसी गंभीर मरीज की हालत बिगाड़ दे तो जिम्मेदारी कौन लेगा?

गांव में डॉक्टर चाहिए, लेकिन योग्य डॉक्टर। तत्काल इलाज चाहिए, लेकिन सुरक्षित इलाज। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी का समाधान बिना योग्यता वाले लोगों को इलाज की छूट देना नहीं हो सकता।

स्वास्थ्य विभाग को निगरानी और कड़ी करनी होगी

ऐसी शिकायतों को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग को ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में नियमित औचक निरीक्षण करना होगा। पंचायतों को भी अपने क्षेत्र में चिकित्सा गतिविधियों की जानकारी रखने के लिए सक्रिय किया जाना चाहिए। कौन व्यक्ति इलाज कर रहा है, उसकी योग्यता क्या है, उसका पंजीयन है या नहीं और वह किस प्रकार की चिकित्सा सेवा दे रहा है—इन सवालों का जवाब प्रशासनिक रिकॉर्ड में होना चाहिए।

सिर्फ शिकायत आने के बाद कार्रवाई करने के बजाय सक्रिय निगरानी जरूरी है। क्योंकि कार्रवाई की भनक लगने के बाद कथित झोलाछापों के ठिकाना बदल लेने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

सरकारी डॉक्टर और निजी क्लीनिक की चर्चा भी जांच का विषय

ग्रामीण क्षेत्रों में एक और गंभीर चर्चा सुनने को मिलती है। कई स्थानों पर लोग आरोप लगाते हैं कि कुछ सरकारी अस्पतालों में पदस्थ डॉक्टर सरकारी अस्पताल में मरीजों को पर्याप्त समय देने के बजाय निजी क्लीनिक में अधिक समय देते हैं। यह भी कहा जाता है कि कुछ मरीजों को सरकारी अस्पताल से निजी क्लीनिक की ओर भेजकर आयुष्मान योजना के माध्यम से इलाज के नाम पर निजी कमाई की जाती है।

इन आरोपों की पुष्टि आवश्यक है और किसी डॉक्टर को बिना जांच दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन यदि ऐसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो स्वास्थ्य विभाग को इसकी भी निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। सरकारी अस्पताल में पदस्थ चिकित्सक का पहला दायित्व सरकारी स्वास्थ्य सेवा में आने वाले मरीजों के प्रति है। यदि कोई व्यक्ति सरकारी व्यवस्था का उपयोग निजी लाभ के लिए कर रहा है तो यह केवल विभागीय अनुशासन का नहीं, बल्कि गरीब मरीजों के अधिकार का भी सवाल है।

सवाल आखिर व्यवस्था से है

रायगढ़ सहित वनांचल क्षेत्रों में गरीब ग्रामीण को ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए, जहां उसे बीमारी के समय गांव में गलत इलाज की मजबूरी न हो और अस्पताल पहुंचने के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े। झोलाछापों पर कार्रवाई के साथ सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।

क्योंकि जब अस्पताल दूर होगा, डॉक्टर उपलब्ध नहीं होगा और निगरानी कमजोर होगी, तब झोलाछाप का कारोबार अपने आप खत्म नहीं होगा।

अब स्वास्थ्य विभाग के सामने चुनौती साफ है—क्या वह शिकायतों, वीडियो साक्ष्यों और ग्रामीणों की बातों को गंभीरता से लेकर जमीनी जांच करेगा, या फिर स्पष्टीकरण लेकर फाइल बंद होती रहेगी?

आखिर सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं, वनांचल के उस गरीब मरीज की जिंदगी का है, जिसके पास बीमारी के समय विकल्प बहुत कम और भरोसा बहुत ज्यादा होता है।

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