Home देश BRICS Summit 2026: 7 साल बाद भारत आ सकते हैं शी जिनपिंग,...

BRICS Summit 2026: 7 साल बाद भारत आ सकते हैं शी जिनपिंग, दिल्ली में होने वाली बैठक पर अमेरिका से चीन तक की नजर

0

नई दिल्ली : भारत इस सप्ताह 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में होने वाली इस अहम बैठक पर भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। भारत इस समय BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। सम्मेलन में सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ साझेदार और आउटरीच देशों के प्रतिनिधियों के भी शामिल होने की संभावना है।

इस सम्मेलन का महत्व इसलिए और बढ़ गया है क्योंकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा संभावित मानी जा रही है। भारत और चीन के बीच सीमा समेत कई रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की एक मंच पर मौजूदगी को कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या है BRICS और कैसे हुई इसकी शुरुआत?

BRICS उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समूह है। इसकी शुरुआत वर्ष 2006 में BRIC के रूप में हुई थी। उस समय ब्राजील, रूस, भारत और चीन इसके सदस्य थे। वर्ष 2009 में पहला BRIC शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ।

इसके बाद 2010 में दक्षिण अफ्रीका के समूह में शामिल होने के साथ इसका नाम BRICS हो गया। पिछले कुछ वर्षों में समूह का तेजी से विस्तार हुआ और अब इसमें 11 सदस्य देश शामिल हैं।

BRICS का मूल उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाना, विकास को गति देना और वैश्विक मंचों पर विकासशील एवं उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका को मजबूत करना है।

अब BRICS में शामिल हैं 11 देश

वर्तमान में BRICS में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया शामिल हैं।

समूह के विस्तार के बाद इसका प्रभाव एशिया से लेकर अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण अमेरिका तक फैल गया है। यही वजह है कि BRICS अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक राजनीति और रणनीतिक मामलों में भी इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है।

दिल्ली में होने वाली बैठक में किन मुद्दों पर होगी चर्चा?

18वीं BRICS शिखर बैठक 12 और 13 सितंबर को दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होगी। सम्मेलन में सदस्य देशों के नेता वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियों पर विचार-विमर्श करेंगे।

बैठक के एजेंडे में व्यापार, वित्तीय सहयोग, विकास, तकनीक, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक शासन व्यवस्था और आपसी सहयोग जैसे विषय प्रमुख रह सकते हैं। भारत की अध्यक्षता में होने वाला यह सम्मेलन साझा प्राथमिकताओं पर सहमति बनाने और BRICS के भविष्य की दिशा तय करने के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।

शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा क्यों है खास?

BRICS सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित मौजूदगी भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। भारत और चीन के संबंधों में सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण लंबे समय से तनाव रहा है।

ऐसे में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के आमने-सामने आने से द्विपक्षीय बातचीत के लिए नया अवसर बन सकता है। हालांकि BRICS एक बहुपक्षीय मंच है, लेकिन शिखर सम्मेलन के दौरान भारत-चीन के बीच अलग से बातचीत की संभावना भी कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाएगी।

BRICS पर अमेरिका की भी क्यों है नजर?

BRICS के लगातार विस्तार ने अमेरिका और पश्चिमी देशों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। समूह वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने की वकालत करता है।

BRICS के विस्तार के साथ सदस्य देशों की संयुक्त आर्थिक और जनसंख्या संबंधी ताकत भी काफी बढ़ी है। ऐसे में डॉलर, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वित्तीय व्यवस्था और वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर BRICS की भूमिका को गंभीरता से देखा जा रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी BRICS को लेकर कई बार अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं। ऐसे में दिल्ली सम्मेलन में होने वाली चर्चा और संभावित फैसलों का असर BRICS देशों से आगे वैश्विक स्तर पर भी देखा जा सकता है।

भारत के लिए BRICS क्यों है बेहद महत्वपूर्ण?

BRICS भारत को एक ही मंच पर चीन और रूस जैसी बड़ी शक्तियों के साथ संवाद का अवसर देता है। इसके अलावा भारत ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को और मजबूत कर सकता है।

भारत के लिए BRICS का एक बड़ा महत्व ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करना भी है। भारत खुद को विकासशील देशों की चिंताओं और प्राथमिकताओं को वैश्विक मंच पर प्रभावी तरीके से उठाने वाले देश के रूप में स्थापित करना चाहता है।

खास बात यह है कि BRICS में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ भारत अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी भी जारी रख सकता है। यही संतुलन भारत की विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।

संयुक्त राष्ट्र, IMF और विश्व बैंक में सुधार की मांग

BRICS लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करता रहा है।

BRICS देशों का तर्क है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों का योगदान लगातार बढ़ा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उनकी हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व उसी अनुपात में नहीं बढ़ा है।

समूह वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की अधिक भागीदारी चाहता है। इसी दिशा में BRICS देशों ने न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना भी की है।

क्या BRICS बन सकता है G7 का विकल्प?

BRICS के विस्तार ने निश्चित तौर पर इसकी आर्थिक और राजनीतिक क्षमता को बढ़ाया है। समूह में दुनिया की बड़ी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा शामिल है।

हालांकि इसे G7 जैसी एकजुट ताकत बनने के रास्ते में कई चुनौतियां भी हैं। सदस्य देशों के राजनीतिक और रणनीतिक हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं। भारत और चीन के बीच सीमा एवं रणनीतिक मतभेद हैं, जबकि रूस और पश्चिमी देशों के संबंधों में भी गहरा तनाव है।

इसलिए असली चुनौती यह होगी कि BRICS अपनी विशाल आर्थिक और जनसांख्यिकीय ताकत को एकजुट वैश्विक प्रभाव में कितना बदल पाता है। दिल्ली में होने वाला 18वां शिखर सम्मेलन इसी दिशा में BRICS की आगे की भूमिका का संकेत दे सकता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here