जगदलपुर: छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक बस्तर दशहरा में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे के बाद काछन गादी रस्म को लेकर नया विवाद सामने आया है। जगदलपुर के लालबाग मैदान में आयोजित दशहरा उत्सव की प्रतीकात्मक प्रदर्शनी के दौरान राष्ट्रपति की मुलाकात काछन देवी की परंपरा से जुड़ी बच्ची पीहू दास के बजाय किसी दूसरी बच्ची से कराए जाने पर पनका समाज ने नाराजगी जताई है। समाज के प्रतिनिधियों ने इसे परंपरा से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए कांटों के झूले का विसर्जन नहीं करने का फैसला किया है। साथ ही चेतावनी दी है कि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे अगले वर्ष बस्तर दशहरा में शामिल नहीं होंगे।
तीन साल से काछन देवी की भूमिका निभा रही हैं पीहू दास
बस्तर दशहरा करीब 75 दिनों तक चलने वाला विशिष्ट सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन है। इस वर्ष राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी इसमें शामिल हुईं। उनके दौरे के दौरान लालबाग मैदान में उत्सव की विभिन्न रस्मों को दर्शाने वाली प्रतीकात्मक प्रदर्शनी लगाई गई थी। इसी प्रदर्शनी में काछन गादी रस्म का भी चित्रण किया गया, जहां राष्ट्रपति की मुलाकात एक बच्ची से हुई।
पनका समाज के प्रतिनिधियों के मुताबिक, पीहू दास पिछले तीन वर्षों से काछन गादी रस्म में कांटों के झूले पर लेटकर काछन देवी की भूमिका निभा रही हैं। परंपरा के अनुसार, इस रस्म में देवी की भूमिका निभाने वाली बच्ची राजपरिवार को बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति देती है। समाज के लोगों की आपत्ति है कि राष्ट्रपति के सामने इस परंपरा को प्रदर्शित करते समय पीहू दास को शामिल नहीं किया गया और उनकी जगह दूसरी बच्ची से मुलाकात कराई गई।
मूल बच्ची को सामने लाना देवी का अपमान: सांसद महेश कश्यप
बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष और बस्तर सांसद महेश कश्यप ने इस विवाद पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनी में रस्म का प्रतीकात्मक चित्रण किया गया था और मूल बच्ची को वहां खड़ा करने से काछन देवी का अपमान होता। उन्होंने राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए कहा कि कार्यक्रम में सीमित लोगों को ही भूमिका निभाने का अवसर मिल पाया।
सांसद ने यह भी कहा कि मुरिया दरबार में पनका समाज के लोग मौजूद थे। उन्होंने समाज के प्रतिनिधियों की नाराजगी दूर करने के लिए दिल्ली में राष्ट्रपति से उनकी मुलाकात कराने का प्रयास करने का आश्वासन दिया।
लखेश्वर बघेल ने किया पनका समाज का समर्थन
कांग्रेस विधायक लखेश्वर बघेल ने भी पनका समाज की नाराजगी का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति का बस्तर दशहरा में शामिल होना क्षेत्र के लिए शुभ संकेत है, लेकिन शासन-प्रशासन परंपराओं को बिगाड़ने का काम कर रहा है।
बघेल ने काछन देवी की परंपरा के अलावा जोगी को समय से पहले हटाने और रथ निर्माण में जुटे लोगों को पहले ही छुट्टी दिए जाने पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि राष्ट्रपति को इस परंपरा की जानकारी देकर पनका समाज और रस्म से जुड़ी बच्ची की मुलाकात कराई जा सकती थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इस मुद्दे पर पनका समाज के साथ खड़े हैं।
मुख्य पुजारी ने जताई नाराजगी, प्रशासन पर लगाए आरोप
मामले को लेकर मुख्य पुजारी गणेश दास ने भी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन ने उनके साथ खिलवाड़ किया है। उनके मुताबिक, रस्म के लिए किसी और बच्ची को बैठाया जा रहा था, जबकि राष्ट्रपति से मुलाकात दूसरी बच्ची की कराई गई।
मुख्य पुजारी ने दावा किया कि राष्ट्रपति से मिलवाई गई बच्ची न तो उनके परिवार की है और न ही वे उसे जानते हैं। इस घटनाक्रम को लेकर पनका समाज के प्रतिनिधियों में नाराजगी बनी हुई है।
कांटों के झूले का विसर्जन नहीं करने का फैसला
पनका समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि परंपरा के अनुसार 24 अक्टूबर को कांटों के झूले का विसर्जन किया जाना था, लेकिन अब वे इसे नहीं करेंगे। उनका कहना है कि राष्ट्रपति से मुलाकात करने वाली बच्ची ही झूले का विसर्जन करेगी।
समाज ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी बात नहीं मानी गई तो वे अगले बस्तर दशहरा से दूरी बना लेंगे और इस रस्म में हिस्सा नहीं लेंगे। ऐसे में काछन गादी रस्म को लेकर उपजा विवाद अब परंपरा, आयोजन व्यवस्था और समाज की भागीदारी से जुड़ा अहम मुद्दा बन गया है।




