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‘मौत के ठीक पहले दिया गया बयान दोषसिद्धि का आधार’.. बिलासपुर HC ने बरक़रार रखा आरोपी के आजीवन कारावास की सजा

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बिलासपुर :  हाईकोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 32(1) के अंतर्गत वैध मृत्यु पूर्व कथन की स्वीकार्यता को बरकरार रखा है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने आपराधिक अपील को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 के तहत दोषी ठहराया। अभियुक्त को अपनी पत्नी ओमबाई बंजारे की हत्या के लिए दोषी पाते हुए अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला दिया और स्पष्ट किया कि यदि मृत्यु पूर्व कथन स्वैच्छिक, विश्वसनीय और मानसिक रूप से स्वस्थ अवस्था में दिया गया हो, तो वह दोषसिद्धि का एकमात्र आधार हो सकता है।

क्या है पूरा मामला?

गौरतलब है कि 19 दिसंबर 2016 को महासमुंद जिले के नवापारा अचारीडीह में राजकुमार बंजारे की पत्नी ओमबाई बंजारे गंभीर रूप से झुलस गई थी। अभियोजन पक्ष ने साबित किया कि अभियुक्त राजकुमार बंजारे ने अपनी पत्नी को लगातार परेशान किया और रुपयों की मांग करता था। इससे तंग आकर पीड़िता ने अपने शरीर पर केरोसिन डालकर आग लगा ली। घटना के बाद उसे महासमुंद के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां पुलिस और नायब तहसीलदार ने उसके दो मृत्यु पूर्व बयान दर्ज किए।

कोर्ट का फैसला

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मृत्यु पूर्व बयानों की वैधता और अलग-अलग समय पर दर्ज किए गए तीन मृत्यु पूर्व बयानों में विसंगतियों की जांच की। पहले दो बयानों में आग लगने की वजह दुर्घटना बताई गई, जबकि तीसरे बयान में आरोपी को दोषी ठहराया गया। अदालत ने तीसरे मृत्यु पूर्व बयान और अस्पताल में दर्ज की गई अनौपचारिक शिकायत में दिए गए विस्तृत बयान को विश्वसनीय माना।

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