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आमला एकादशी के दिन क्यों होती है आंवले की पेड़ की पूजा, कैसे शुरू हुई परंपरा?

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7 मार्च 2025:- हिंदू धर्म में एकादशी की तिथि बड़ी पावन और महत्वपूर्ण मानी गई है. हर महीने दो एकादशी व्रत पड़ते हैं. इस तरह साल भर में एकादशी के 24 व्रत पड़ते हैं. एकादशी का व्रत जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित किया गया है. हर एकादशी के व्रत का अपना महत्व और लाभ है. फाल्गुन महीने में पड़ने वाली एकादशी आमलकी एकादशी होती है. इसे आमला एकादशी भी कहा जाता है.

आमलकी एकादशी के दिन जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु के व्रत और पूजन का विधान है. इस दिन जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु का व्रत और पूजन करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश हो जाता है. जीवन के कष्ट और दुख दूर होते हैं. जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का वास बना रहता है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ-साथ आंवले के पेड़ की पूजा होती है. इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा शुभ मानी गई है, लेकिन इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा क्यों की जाती है. इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई? आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.

हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 9 मार्च को सुबह 7 बजकर 45 मिनट पर हो जाएगी. वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन 10 मार्च को सुबह 7 बजकर 44 मिनट पर हो जाएगा. हिंदू धर्म में उदया तिथि मानी जाती है. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, आमलकी एकादशी का व्रत 10 मार्च को रखा जाएगा. वहीं व्रत के पारण का समय 11 मार्च को सुबह 6 बजकर 35 मिनट से 8 बजकर 13 मिनट तक रहेगा.

ऐसे शुरु हुई आंवले की पूजा की परंपरा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी को ये जानने की इच्छा हुई कि आखिर वो उतपन्न कैसे हुए. ये जानने के लिए उन्होंने कठोर तप करना शुरू कर दिया. भगवान विष्णु उनके तप से प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए. भगवान विष्णु को देखकर ब्रह्मा जी भावुक हो गए और उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े. ब्रह्मा जी की आंख से निकले आंसू नारायण के चरणों में गिरे और उससे ही आंवले का पेड़ उतपन्न हो गया. इसके बाद भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी से कहा कि आज से वो आंवले के पेड़ में रहेंगे. जो भी आंवले के पेड़ की पूजा करेगा उसको शुभ फल प्राप्त होंगे और उसकी सभी इच्छाओं की पूर्ति होगी. ये सब फाल्गुन माह की एकादशी के दिन हुआ. तब से ही फाल्गुन माह की एकादशी पर आंवले के पेड़ की पूजा की परंपरा शुरू हो गई. इस एकादशी के दिन आंवले की पूजा और परिक्रमा करने से मरने के बाद वैकुंठ धाम में स्थान प्राप्त होता है.

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