
राजस्थान:- राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है. यहां विराजित बाबा श्याम की मनमोहक मूर्ति भक्तों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है. इस मूर्ति से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प रहस्य है, जिसे जानकर हर कोई हैरान रह जाता है वो है बाबा श्याम की मूर्ति का रंग बदलना. जी हां, आपने सही सुना. खाटू श्याम की मूर्ति कृष्ण पक्ष में पीली और शुक्ल पक्ष में काली हो जाती है. यह परिवर्तन कैसे होता है और इसके पीछे क्या कारण है, आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं.
रंग बदलने का कारण, श्रृंगार और अभिषेक का अनोखा संगम:- बाबा श्याम की मूर्ति का रंग बदलने का मुख्य कारण उनके विशेष श्रृंगार (सजावट) और अभिषेक (स्नान) की प्रक्रिया है. यह कोई प्राकृतिक या अलौकिक घटना नहीं, बल्कि मंदिर की परंपरा और धार्मिक विधान का हिस्सा है.
कृष्ण पक्ष में पीला रंग:- जब कृष्ण पक्ष आता है, तो बाबा श्याम की मूर्ति को श्याम वर्ण (सांवला या गहरा रंग) के रूप में सजाया जाता है. इस दौरान, उनके श्रृंगार में ऐसे तत्वों और वस्त्रों का उपयोग किया जाता है, जो मूर्ति को पीले रंग का आभास देते हैं. यह पीला रंग अक्सर हल्के या सुनहरे रंग की आभा लिए होता है, जो बाबा के सांवले रूप को और भी दिव्य बनाता है. यह उनके उस रूप का प्रतीक है जब वे धरती पर प्रकट हुए थे या जिस रूप में उन्हें अक्सर कृष्ण के समान देखा जाता है.
शुक्ल पक्ष में काला रंग:- वहीं, जब शुक्ल पक्ष का आगमन होता है, तो बाबा श्याम को उनके पूर्ण शालिग्राम (काला) रूप में सजाया जाता है. शालिग्राम भगवान विष्णु का एक पवित्र स्वरूप है, जिसका रंग आमतौर पर काला या गहरा होता है. इस दौरान, मूर्ति का अभिषेक भी विशेष तरीके से किया जाता है, जिससे वह गहरी काली दिखाई देती है. यह काला रंग उनकी दिव्यता, शाश्वतता और सभी लोकों के स्वामी होने का प्रतीक है. यह रंग परिवर्तन भक्तों के लिए किसी रहस्य से कम नहीं, लेकिन यह मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है, जहां बाबा को अलग-अलग स्वरूपों में सजाया जाता है, जो उनके विभिन्न गुणों और दिव्य लीलाओं को दर्शाते हैं.
धार्मिक महत्व और मान्यताएं:- खाटू श्याम जी को भगवान श्रीकृष्ण के कलयुगी अवतार के रूप में पूजा जाता है. ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल में बर्बरीक जो बाद में खाटू श्याम कहलाए उन्होंने भगवान कृष्ण को अपना शीश दान कर दिया था. भगवान कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया था कि कलयुग में उनकी पूजा उनके नाम से होगी.



