Home आस्था कब है संतान सप्तमी 2025? जानें महत्व, तिथि और शुभ मुहूर्त…

कब है संतान सप्तमी 2025? जानें महत्व, तिथि और शुभ मुहूर्त…

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हिंदू पंचांग में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी कहा जाता है. यह व्रत खासतौर पर संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए किया जाता है. माना जाता है इस दिन विधि-विधान से व्रत-पूजा करके अपने बच्चों के जीवन से संकट दूर कर सकते हैं.भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष सप्तमी को संतान सप्तमी का व्रत किया जाता है. यह व्रत विशेष रूप से संतान सुख, उनकी लंबी उम्र और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखा जाता है. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत करने से संतान का स्वास्थ्य, भाग्य और जीवन खुशियों से भर जाता है. संतान सप्तमी व्रत आस्था, भक्ति और प्रेम का प्रतीक है. सही विधि से व्रत करने पर संतान सुख, खुशहाल जीवन और पारिवारिक समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है. संतान सप्तमी सिर्फ एक व्रत नहीं, बल्कि माता-पिता के अपने बच्चों के प्रति प्रेम और चिंता का प्रतीक है. श्रद्धा और विश्वास से किया गया यह व्रत संतान को दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुखमय जीवन प्रदान करता है.

संतान सप्तमी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त

तिथि: 30 अगस्त 2025, शनिवार

सप्तमी तिथि प्रारंभ: 29 अगस्त, रात 8:25 बजे

सप्तमी तिथि समाप्त: 30 अगस्त, रात 10:46 बजे

पूजा का शुभ मुहूर्त: सुबह 11:05 बजे से दोपहर 12:47 बजे तक

पौराणिक कथा

कहानी के अनुसार, एक समय राजा की पत्नी की सात संतानें थीं, लेकिन सभी की अल्पायु में मृत्यु हो गई. दुखी होकर रानी ने एक साधु से उपाय पूछा. साधु ने उन्हें भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को माता सत्वती का व्रत करने की सलाह दी. रानी ने पूरी श्रद्धा से व्रत किया, जिसके बाद उन्हें एक स्वस्थ और दीर्घायु पुत्र प्राप्त हुआ. तब से यह व्रत संतान की रक्षा और आयु वृद्धि के लिए किया जाने लगा.

ज्योतिषीय मान्यता

ज्योतिष में सप्तमी तिथि सूर्यदेव को समर्पित मानी जाती है. सूर्य जीवनदाता और आरोग्य के देवता हैं, इसलिए इस दिन व्रत और पूजा से नकारात्मक ग्रह दोष शांत होते हैं और बच्चों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. जिनकी कुंडली में पितृ दोष या संतान सुख में बाधा हो, उनके लिए यह व्रत विशेष फलदायी है.

संतान सुख के उपाय

संतान सप्तमी पर पीपल के पेड़ में जल अर्पित करें और संतान की लंबी उम्र की कामना करें.

छोटे बच्चों को भोजन कराएं और उन्हें लाल वस्त्र भेंट दें.

सूर्यदेव को गुड़ और गेहूं का भोग लगाएं.

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