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श्रध्दा पूर्वक श्राद्ध तर्पण करने के बाद पक्ष के अंतिम दिन पितृदेवो को दी गई विदाई

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रिपोर्टर मुन्ना पांडेय सरगुजा : भारतीय संस्कृति में पूर्वजों को स्मरण करना उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना ही पितृपक्ष है इसे स्थानीय बोलचाल की भाषा में पितरपख भी कहते हैं। भाद्र मास के शुक्ल पूर्णिमा तिथि से शुरू होकर अश्वनी ( क्वांर महिने) के कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि पर जाकर पितृपक्ष सम्पन्न होती है। धर्म शास्त्र के मुताबिक 15 दिनों तक का अवधि पूर्वजों के आत्म शांति एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए शुभ मानी गई है। इस एक पक्ष के भीतर अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध तर्पण दान जैसे संस्कार किये जाने की परिपाटी रही है। ऐसा माना जाता है कि पिरतपख में पितृलोक से पितृदेव धरती में निवास करते हैं। अपने कुटुंबियों द्वारा किये गये श्राद्ध तर्पण दान आदि से तृप्त हो कर आशीर्वाद देते हैं। क्वांर महिने के कृष्ण पक्ष में श्रद्धालू अपने पितरों के आत्मशांति के लिए श्राद्ध तर्पण करते हैं।

दरअसल पितृपक्ष पूर्वजों को याद करने का एक पर्व है ।अपने पूर्वजों के सम्मान में श्रद्धा पूर्वक किये जाने वाला श्राद्ध तर्पण ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा है। नगर लखनपुर सहित आसपास ग्रामीण क्षेत्रों में पितृपक्ष के अंतिम 21 सितम्बर दिन रविवार को पितृ विसर्जन किया गया। श्रद्धालुओं ने जहा पक्षभर श्राद्ध तर्पण करते हुए तिथि वार ब्राह्मणों को भोजन कराया वहीं स्नान दान करने की परम्परा को भी बखूबी निभाया । क्षेत्र में लोगों ने अपने प्रथा चलन के मुताबिक नदी तालाब जलसरोवरो में पितृ अमावस्या तिथि को पितृ विसर्जन किये। ब्राह्मणों जरूरतमंदों को भोजन कराने के बाद दान-दक्षिणा दिये। इस तरह से पितृपक्ष का धार्मिक सफर सम्पन्न हुआ।

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