नई दिल्ली : गुलाम जम्मू-कश्मीर की घाटियों को खून से लथपथ बताते हुए एक मानवाधिकारी विशेषज्ञ ने सस्ती बिजली, आटा और सम्मान जैसे बुनियादी अधिकारों की मांग कर वहां के प्रदर्शनकारियों की पाकिस्तानी सेना द्वारा हत्या की आलोचना की है। उन्होंने इस क्रूरता पर वैश्विक चुप्पी को लेकर सवाल उठाए हैं और पश्चिमी व इस्लामी देशों पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया।
टाइम्स ऑफ इजरायल की वेबसाइट पर माइकल अरिआंती के एक ब्लॉग में कहा है, ‘जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के नेतृत्व में एक हफ्ते से ज्यादा समय से मुजफ्फराबाद, रावलकोट, धीरकोट और मीरपुर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। ये प्रदर्शनकारी सस्ती बिजली, सस्ता आटा और सम्मान की मांग कर रहे हैं। ये बुनियादी अधिकार हैं, फिर भी इनका जवाब गोलियों, कफ्र्यू और संचार व्यवस्था ठप करके दिया जा रहा है।’
उन्होंने सवाल किया, एक फलस्तीनी की मौत दुनियाभर में सुर्खियां जाती है, लेकिन मुजफ्फराबाद या धीरकोट में एक कश्मीरी मुसलमान की मौत, एक फुटनोट भर क्यों है? दोनों पीड़ित हैं, दोनों सम्मान की गुहार लगा रहे हैं और फिर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय तय करता है कि किसकी पीड़ा मायने रखती है। क्या कश्मीरी खून की कीमत कम है? क्या पाकिस्तानी दमन किसी तरह से स्वीकार्य है?
ब्लॉग में कहा गया है कि पाकिस्तान की लगभग एक-तिहाई पनबिजली पैदा करने वाले गुलाम जम्मू-कश्मीर में निवासी अभी भी अत्यधिक शुल्क चुकाते हैं, जो अक्सर उत्पादन लागत से दस गुना ज्यादा होता है। इस्लामाबाद और इस क्षेत्र का अभिजात वर्ग मुफ्त में बिजली, ईंधन और अनियंत्रित विशेषाधिकारों का आनंद लेते हैं, जबकि स्थानीय लोग 40-50 रुपये प्रति यूनिट की दर से भुगतान करते हैं, जबकि उत्पादन लागत 4-7 रुपये है।



