Home आस्था काल भैरव क्यों कहलाते हैं तांत्रिकों के ईष्ट देव?

काल भैरव क्यों कहलाते हैं तांत्रिकों के ईष्ट देव?

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हिंदू धर्म में भगवान शिव के अनेक रूपों में काल भैरव का स्वरूप सबसे शक्तिशाली और रौद्र माना जाता है. वे समय, न्याय और अधर्म नाश के देवता हैं. काल का अर्थ है समय और भैरव का अर्थ है भय का नाश करने वाला. इस वर्ष काल भैरव जयंती 12 नवंबर बुधवार को मनाई जाएगी. यही कारण है कि तंत्र साधना में वे विशेष स्थान रखते हैं और तांत्रिक साधकों के ईष्ट देव माने जाते हैं. उनका तेज और रौद्र रूप साधक को नकारात्मक शक्तियों, भय और संकटों से मुक्ति दिलाने में सक्षम बनाता है.

तंत्र साधना में काल भैरव का महत्व:- तंत्र साधना का मुख्य उद्देश्य साधक को उसकी मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक सीमाओं से ऊपर उठाना होता है. इस साधना में भगवान काल भैरव की उपासना अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है. साधक उनके मंत्र जप, यंत्र पूजन और ध्यान के माध्यम से उनकी कृपा प्राप्त करता है. काल भैरव का तेज और शक्ति नकारात्मक शक्तियों, भय और संकटों से मुक्ति दिलाती है. उनकी उपासना से साधक अपने भीतर की ऊर्जा को जागृत करता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है और जीवन में स्थिरता और साहस की प्राप्ति करता है. यही कारण है कि तांत्रिक साधक उन्हें अपने ईष्ट देव मानते हैं.

रौद्र रूप और शक्ति का साधन:-काल भैरव का रौद्र रूप न केवल भय और संकट निवारण का प्रतीक है, बल्कि यह साधक को अनुशासन, साहस और आत्मबल की ओर मार्गदर्शन भी करता है. तांत्रिक साधना में साधक उनके तेजस्वी और प्रचंड स्वरूप के माध्यम से अपने भीतर की नकारात्मक शक्तियों, अहंकार और भय का विनाश करता है. यह साधना न केवल मानसिक शांति प्रदान करती है, बल्कि जीवन में सुरक्षा और आध्यात्मिक विकास की दिशा भी दिखाती है. साधक अपने अंदर साहस, संयम और ध्यान की गहरी क्षमता अनुभव करता है.

असुरों और नकारात्मक शक्तियों पर विजय:- काल भैरव की आराधना साधक को केवल आंतरिक शक्ति प्रदान नहीं करती, बल्कि जीवन की बाहरी बाधाओं, असुरों और नकारात्मक शक्तियों पर भी विजय दिलाती है. तंत्र साधना में उनकी उपासना का मूल उद्देश्य साधक को भय, संकट और मानसिक अस्थिरता से मुक्ति दिलाना है. साधक जब उनके मंत्र जप, ध्यान और यंत्र पूजा करता है, तो उसके चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है. यह आराधना जीवन में स्थिरता, सुरक्षा और साहस लाती है, साथ ही आध्यात्मिक विकास और आत्मबल की वृद्धि करती है, जिससे साधक अपने भीतर की शक्तियों का अनुभव करता है.

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