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Mahabharat Katha: इस कथा से जानें, क्यों कर्ण का सबसे बड़ा पुण्य ही उसकी हार का आधार बना

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सूर्य पुत्र कर्ण, महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक रहा है, जो सबसे कुशल योद्धाओं में से भी एक था। महाभारत में वर्णित है कि कर्ण का जन्म एक दिव्य कवच और कुंडल के साथ हुआ था, जो उसे सूर्य देव के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ था। इस कवच-कुंडल के कारण वह अजेय था, यानी उसे कोई नहीं हरा सकता था।

इंद्र देव ने लिया ब्राह्मण का रूप
महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, युद्ध से पहले एक बार कर्ण रोजाना की तरह अपनी सुबह की पूजा कर रहे थे और सूर्य देव को जल अर्पित कर रहे थे। तभी वहां इंद्र देव एक ब्राह्मण का वेश लेकर आए। ब्राह्मण को देखकर कर्ण ने पूछा कि “हे ब्राह्मण! आपके दर्शन पाकर मैं बहुत धन्य हुआ। मैं आपकी किस प्रकार सेवा कर सकता हूं?”

इंद्र देव ने जताई ये इच्छा
इसपर ब्राह्मण के रूप में इंद्र देव ने कहा कि मैंने आपकी दानवीरता के अनेक किस्से सुने हैं। मैं आपके सबसे कीमती कवच और कुंडल दान के रूप में मांगने आया हूं।” कर्ण यह जान गया था कि यह ब्राह्मण नहीं, बल्कि साक्षात इंद्र देव हैं। लेकिन कर्ण दान देना अपना धर्म अर्थात कर्तव्य मानता था।

उसने देवराज इंद्र से कहा कि यह कवच और कुंडल मेरे शरीर से जुड़ा हुआ है। तब उसने अपनी छुरी निकाली और उसकी मदद से अपने शरीर से कवच-कुंडल को अलग करके ब्राह्मण के रूप में इंद्र देव को दान कर दिया। कर्ण का यह अडिग संकल्प देखकर इंद्र देव प्रसन्न हुए।

इसलिए करना पड़ा था कर्ण से छल
अर्जुन, इंद्र देव का पुत्र था और वह महाभारत के युद्ध में अपने पुत्र की कर्ण से रक्षा करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपना रूप बदलकर छल करके कर्ण से उसका जन्मजात कवच-कुंडल दान के रूप में मांग लिया। ताकि अर्जुन को युद्ध जीतने का अवसर मिल सके।

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