
- कहा-जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम थकान, तनाव और चिड़चिड़ापन भी बढ़ा देता है
- शिशु संस्कार में बच्चों, अभिभावकों को मोबाइल लत से बचाने जागरूकता कार्यक्रम
महासमुंद: आस्था वेलफेयर सोसायटी महासमुंद ने शिशु संस्कार केंद्र महासमुंद के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को मीडिल स्कूल के बच्चों के लिए शाला परिसर में मोबाइल नशे के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रम के तहत पोस्टर, पोस्टर प्रदर्शनी स्पर्धा व मोबाइल उपयोग पर कार्यशाला आयोजित की। कार्यशाला में बच्चों व पालकों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सोहम अस्पताल के डायरेक्टर डाक्टर युगल चंद्राकर थे। अध्यक्षता स्कूल के संचालक पारस चोपड़ा ने की। विशेष अतिथि व वक्ता के रूप में पुलिस विभाग से चित्रलेखा नवरंगे, समाज कल्याण विभाग से अनिल कोसरिया, पत्रकार उत्तरा विदानी, आस्था संस्था की ओर से तारिणी चंद्राकर व साथी तथा प्राचार्य अवनीश वाणी उपस्थित थे।
कार्यक्रम के अध्यक्ष पारस चोपड़ा ने कहा कि बच्चे और पालक दोनों को स्कूल के नियमों का पालन करते हुए बच्चे के उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर होना चाहिए। बच्चे में यदि किसी भी तरह की लत देखें तो पालक तत्काल एक्टिव हो जाएं और बच्चे को शांत मन से उस लत से छुटकारे की पहल करें। यदि शिक्षकों के सहयोग की जरूरत पड़े तो स्कूल पहुंचकर शिक्षकों से सहयोग लें। अपने बच्चे को नित्य प्रति स्कूल भेजें और अपने बच्चे के हर एक्टिविटीज पर ध्यान दें।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डाक्टर युगल चंद्राकर ने बच्चों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया कि मोबाइल किस तरह हमारे दिमाग पर असर करता है। उन्होंने बताया कि आज के समय में मोबाइल फोन बच्चों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। स्कूल से घर तक खेलकूद से पढ़ाई तक, सब कुछ अब स्क्रीन के इर्द-गिर्द घूमने लगा है। कहा कि रिसर्च से पता चलता है कि मोबाइल की गलत आदतें बच्चों के दिमाग और ग्रोथ को कमजोर कर रही हैं। उन्होंने सरल भाषा में बताया कि मोबाइल के बुरे प्रभाव कौन-कौन से हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है।उन्होंने उपस्थित बच्चों और पालकों को बताया कि बच्चों के स्क्रीन टाइम यानी मोबाइल डिवाइस पर बिताया गया समय उनके दिमाग की ग्रोथ, ध्यान, याददाश्त और व्यवहार पर असर डाल सकता है। एक बड़ी समीक्षा में यह पाया गया है कि मोबाइल और डिजिटल तकनीक बच्चों के दिमाग के प्रि.फ्रंटल कॉर्टेक्स हिस्से को प्रभावित करती है, जो एक्जीक्यूटिव फंक्शन्स जैसे कि प्लान बनाना, निर्णय लेना और ध्यान बनाए रखना आदि को कंट्रोल करता है। लगातार मोबाइल फ ोन का इस्तेमाल दिमाग की फोकस क्षमता को कमजोर करता है।
ब्लू लाइट नींद की गुणवत्ता बिगाड़ती है और लंबे समय तक इस्तेमाल से याददाश्त, एकाग्रता और मूड पर नकारात्मक असर पड़ता है। जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम थकान, तनाव और चिड़चिड़ापन भी बढ़ा देता है। समाज कल्याण विभाग से अनिल कोसरिया ने कहा बच्चों को मोबाइल से जो नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई कतई संभव नहीं है। सबसे जरूरी बच्चों को मोबाइल की लत से छुटकारा है। अब हालात क्फी बिगड़ चुका है ऐसे में हमें खासकर पालकों को बच्चे तमाम गतिविधियों पर नजर रखते हुए उनके साथ स्नेह से पेश आने की जरूरत है।
स्कूल के प्राचार्य अवनीश वाणी ने बच्चों को बताया कि मोबाइल भस्मासुर है। वह जिस किसी के हाथ में आता है, वह अपना आपा खो देता है। उन्होंने शिवजी और भस्मासुर वाली अध्याय को जोडक़र बच्चों के बीच प्रस्तुत करते कहा कि मोबाइल देखना गलत नहीं है. उसे आदत में शामिल करना गलत है। जब वह हमारी आदत में शामिल हो जाता है तो हमारा नींद, चैन सब कुछ छीन लेता है और यहांत क हम आत्महत्या तक की बात सोच लेते हैं। उन्होंने गाजियाबाद में तीन बहनों की आत्महत्या का जिक्र करते हुए कहा कि जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं होता। आपके हाथ में रहने वाले मोबाइल फोन आपसे स्मार्ट कभी नहीं हो सकता। हमारा हर बच्चा मोबाइल से कहीं अधिक स्मार्ट है लेकिन दु:खद यह है कि बच्चा खुद के बजाय मोबाइल को स्मार्ट समझकर उससे दोस्ती कर लेता है। वह आपका दोस्त नहीं है। वह सिर्फ भस्मासुर है।
पुलिस विभाग से चित्रलेखा नवरंगे ने बच्चों को बताया कि किस तरह बच्चे मोबाइल के आदी होकर छोटे-बड़े अपराध कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब तो शराब, जुआ, सिगरेट से अधिक मोबाइल के चलते गैरकानूनी काम हो रहा है। जिले के कई बच्चे मोबाइल के लत में फंसकर ही गैर कानूनी काम कर रहे ह। लिहाजा पुलिस विभाग ने स्कूलों में जाकर बच्चों को अन्य नशे की तरह मोबाइल के नशे से छुटकारे के लिए भी जागरुकता कार्यक्रम चला रही है। समाजसेवी तारिणी चंद्राकर ने कहा अब समय आ गया है कि बच्चों के लिए खास पहल किया जाए। बच्चों के बच्चों को माता पिता साथ मिले, यह उनका अधिकार है। जब बच्चे अकेले महसूस करते हैं तो तरह-तरह के लत की ओर झुकाव हो जाता है। जो बड़े बुजुर्ग है, वे भी तब ही बच्चों पर ध्यान देना शुरू करते हैं जब उनका बच्चा किसी न किसी नशे तरह की लत में धंस चुका होता है। ऐसे में बच्चों का असामाजिक होना स्वाभाविक है। जिस समाज में मां बाप भाई बहन समाज के लोग होते हैं, वे ही खुद बच्चों पर ध्यान नहीं देते और बच्चे के संतुलन खो जाने पर उसे असामजिक कहते हैं।
पत्रकार उत्तरा विदानी ने कहा पालकों ने खुद ही बच्चों को समय देना छोड़ दिया है और चाहते हैं कि उनका बच्चा आगे जाकर समाज और परिवार का नाम रौशन करे। जबकि हर पालक को अपने बच्चे का बेस्ट दोस्त बन जाना चाहिए। पालक स्कूल के भरोसे अपने बच्चे को छोडक़र खुद ही मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। बच्चा अकलेपन से ऊबकर मोबाइल से दोस्ती कर लेता है। उसका बुझा हुआ दिमाग मोबाइल से दोस्ती कर लेता है और जो दशा है वह साफ है। हर बच्चा अपने मां बाप और गुरुजनों से सीखता है। गुरू तो श्रृष्टि के शुरुआत से ही समाज निर्माण का कर्तव्य निभा रहा है लेकिन समय बजल चुका है। मोबाइल के प्रवेश के बाद पालकों ने लगभग अपनी जिम्मेदारी खत्म कर दी है। ऐसे में सिर्फ गुरुओं से ही श्रेष्ठ समाज की कल्पना बेईमानी है। पालकों को अपने बच्चे के साथ बच्चा बनना पड़ेगा। सच मानिये कि अपने बच्चे से बढिय़ा दोस्त कोई नहीं हो सकता।इस दौरान बच्चों के लिए पोस्टर मेकिंग प्रतियोगिता भी हुई जिसमें प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ स्थान प्राप्त बच्चों को सोहम हास्पीटल तथा आस्था वेलफेयर संस्था की ओर से पुरस्कार दिया गया। कार्यक्रम का संचालन तारिणी चंद्राकर भावना बजाज ने किया। इस दौरान आस्था संस्था से निरंजना, अर्चना, जय शोभा शर्मा, तुषार चंद्राकर तथा स्कूल स्टाफ मौजूद रहें।



