
हिंदू धर्म में कोई भी पूजा, अनुष्ठान या मांगलिक कार्य तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक वहां ‘कलश’ की स्थापना न हो जाए। कलश को केवल जल का पात्र नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। चलिए, जानते हैं आखिर पूजा में कलश का इतना महत्व क्यों है और इसके पीछे की आध्यात्मिक मान्यताएं क्या हैं।
शास्त्रों के मुताबिक, कलश की स्थापना करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का संचार होता है। यह पात्र समुद्र मंथन के समय निकले अमृत कलश का प्रतीक है, जो सुख और समृद्धि का प्रतिनिधित्व करता है।
कलश स्थापना की सही विधि और नियमपूजा में कलश स्थापित करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है, तभी इसका पूर्ण फल प्राप्त होता है:
पात्र का चुनाव: कलश हमेशा सोना, चांदी, तांबा या मिट्टी का होना चाहिए। लोहे या स्टील के पात्र का प्रयोग वर्जित माना गया है।
कलश में क्या डालें: कलश के भीतर शुद्ध जल के साथ गंगाजल, अक्षत (चावल), कुमकुम, दूर्वा, सिक्का और सुपारी डाली जाती है।
आम के पत्ते: कलश के ऊपर पंच पल्लव (अक्सर आम या अशोक के पत्ते) रखे जाते हैं, जो जीवन में हरियाली और खुशहाली का प्रतीक हैं।
नारियल की दिशा: कलश पर रखे नारियल का मुख हमेशा साधक (पूजा करने वाले) की ओर होना चाहिए।
विशेष तथ्य: पूजा के दौरान पंडित और विद्वान बताते हैं कि कलश की स्थापना से आसपास की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है और पूजा स्थल एक पवित्र मंडल में बदल जाता है। कलश को ‘तीर्थों’ का स्वरूप भी माना जाता है।



