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जेन-जी आंदोलन के बाद नेपाल में चुनावी परीक्षा, पीएम पद की रेस में तीन बड़े चेहरे

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नईदिल्ली  :  पिछले वर्ष हुए हिंसक जनआंदोलनों और सरकार के पतन के बाद नेपाल पहली बार राष्ट्रीय चुनाव कराने जा रहा है। इस महत्वपूर्ण चुनाव में तीन प्रमुख नेता प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी पेश कर रहे हैं।

चुनाव के बाद प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करने वाले दल या गठबंधन का नेता देश का नया प्रधानमंत्री बनेगा। बता दें कि नेपाल में 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा के लिए पांच मार्च को चुनाव होने जा रहा है। यह चुनाव इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि सितंबर में व्यापक जेन-जी प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन पीएम केपी ओली की सरकार को सत्ता छोड़नी पड़ी थी।

नेपाल में 2008 में राजशाही समाप्त होने के बाद से राजनीतिक अस्थिरता लगातार बनी हुई है। पिछले दो दशकों से भी कम समय में देश 15 प्रधानमंत्री देख चुका है और अब नया नेता 16वां प्रधानमंत्री बनेगा।

‘बालेन’ शाह बने लोकप्रिय चेहराप्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में काठमांडू के पूर्व मेयर बलेंद्र शाह, जिन्हें ‘बालेन’ के नाम से जाना जाता है, सबसे चर्चित उम्मीदवार माने जा रहे हैं। 35 वर्षीय शाह पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर रहे हैं और रैप कलाकार के रूप में भी पहचान बना चुके हैं।

उन्होंने 2022 में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में काठमांडू मेयर चुनाव जीता था और पारंपरिक दलों के खिलाफ जनभावना का लाभ उठाया। शहर में अतिक्रमण हटाने, कचरा प्रबंधन सुधार और सड़क विस्तार जैसे कदमों से उन्हें समर्थन मिला, हालांकि बिना पर्याप्त नोटिस के तोड़फोड़ कार्रवाइयों को लेकर आलोचना भी हुई।

नेपाली कांग्रेस से गगन थापा की चुनौतीदूसरे प्रमुख दावेदार नेपाली कांग्रेस के नए अध्यक्ष गगन थापा हैं। 49 वर्षीय थापा लंबे समय से पार्टी का लोकप्रिय चेहरा रहे हैं और हाल में पार्टी नेतृत्व संभालने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत दावेदार बनकर उभरे हैं। भारत से करीबी संबंध रखने वाली नेपाली कांग्रेस पिछली गठबंधन सरकार का हिस्सा थी, जिसे युवा आंदोलन के बाद सत्ता से हटना पड़ा। थापा ने सत्ता में आने पर पांच वर्षों में भ्रष्टाचार खत्म करने और शासन व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का वादा किया है।

वापसी की कोशिश में केपी ओलीतीसरे दावेदार कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद ओली हैं, जिनकी सरकार पिछले वर्ष प्रदर्शनों के बाद गिर गई थी। विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई मौतों के लिए विपक्ष उन्हें जिम्मेदार ठहराता रहा है, लेकिन कम्युनिस्ट समर्थकों के बीच उनका प्रभाव अभी भी मजबूत माना जाता है।

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