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कूटनीति के पुराने ढर्रे खत्म: रूस-यूक्रेन हो या इजरायल-ईरान, अब अपनी शर्तों पर फैसले ले रहा है भारत

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नई दिल्‍ली : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को विशेष रणनीतिक भागीदारी के स्तर तक पहुंचाने का फैसला किया है। इसके तहत दोनों देश रक्षा सहित कई क्षेत्रों में अपने सहयोग का विस्तार करेंगे। पीएम मोदी की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब क्षेत्रीय आक्रामक नीतियों को लेकर इजरायल की आलोचना की जा रही है।

ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले के बीच भारत में भी इस बात पर बहस हो रही है। खासकर तब जब भारत एक स्वतंत्र फलस्तीन के लिए दशकों से प्रतिबद्ध रहा है। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की कूटनीति अब नारों के दायरे से निकल कर राष्ट्रीय हित पर जोर दे रही है।

उनका मानना है कि जब कोई देश बड़ा होने लगता है तो उसके अनेक हित प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से कई देशों से जुड़ते हैं। ऐसे में कौन सा हित उसके लिए पहली प्राथमिकता होगी, उसके आधार पर वह अपना अगला कदम तय करता है।

ऐसे में इजरायल के साथ संबंधों को मजबूत बनाना एक यथार्थवादी रवैया है। रूस और यूक्रेन युद्ध में भी यही स्थिति दिखी और अमेरिका-यूरोप के लगातार दबाव के बावजूद भारत ने यूक्रेन पर हमले के लिए रूस की निंदा नहीं की।

ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के राष्ट्रीय हित रूस के साथ हैं। ऐेसे में सिद्धांतवादी हिचक से निकल राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंधों की दशा-दिशा तय करने वाली रणनीति की पड़ताल बड़ा मुद्दा है…

आर्थिक ताकत के दम पर मुखर हुआ भारतभारत की विदेश नीति अब पहले की तुलना में कहीं अधिक मुखर और नतीजों पर जोर देने वाली हो गई है। इसका सीधा संबंध भारत की तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था और जीडीपी के आकार से है। जब किसी देश की आर्थिक शक्ति बढ़ती है, तो उसकी बात सुनने की दुनिया की मजबूरी और जरूरत दोनों बढ़ जाती है। पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति में आए इस बदलाव को रेखांकित कर रहे हैं महेन्द्र सिंह…

अर्थव्यवस्था का आकार और कूटनीति में बदलावभारत वर्तमान में दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वित्त वर्ष 2026-27 तक इसके तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का अनुमान है। इस आर्थिक बढ़त ने भारत को साफ्ट पावर से स्मार्ट पावर में बदल दिया है।

सैन्य शक्ति और आधुनिकीकरणभारत रक्षा पर खर्च के मामले में अब दुनिया के शीर्ष 3-4 देशों में शामिल है।

  1. 7.85 लाख करोड़-रक्षा बजट
  2. नौसेना विस्तार: 2030 तक नौसेना अपने बेड़े को बढ़ा कर 200 जहाज तक पहुंचाने पर काम कर रही है।
  3. 28% (₹2.19 लाख करोड़) केवल नए हथियारों और तकनीक के लिए है।

रक्षा उपकरणों का निर्यात

  • ब्रह्मोस मिसाइल: फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल बेचना भारत का दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को सीधा जवाब है।
  • आर्मीनिया को पिनाका: आर्मेनिया-अजरबैजान संघर्ष के बीच आर्मेनिया को हथियार देना दिखाता है कि भारत अब वैश्विक संघर्षों में अपने हितों के आधार पर पक्ष लेने से नहीं हिचकता।

रक्षा सौदे और रणनीतिक साझेदारीजब भारत किसी देश से बड़ा रक्षा सौदा करता है, तो वह उस देश को अपने साथ दीर्घकालिक भू-राजनीतिक हितों में बांध लेता है। फ्रांस के साथ 36 राफेल विमानों का सौदा भारत की कूटनीति का मास्टरस्ट्रोक माना जाता है। हाल में भारत की रक्षा खरीद परिषद ने 114 राफेल विमानों की खरीद के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है।

बिना किसी शर्त के समर्थनअमेरिका या दूसरे यूरोपीय देशों के विपरीत फ्रांस ने कभी भी भारत के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया और भारत ने जब परमाणु परीक्षण किया तो प्रतिबंध भी नहीं लगाए। इस सौदे ने फ्रांस को भारत का सबसे भरोसेमंद यूरोपीय साझेदार बना दिया।

एयरोस्पेस इकोसिस्टमसौदे के तहत ‘आफसेट क्लाज’ के जरिये फ्रांस की कंपनियों को भारत में निवेश करना पड़ा, जिससे भारत का अपना एयरोस्पेस इकोसिस्टम मजबूत हुआ।

यूरोप की समस्या दुनिया की समस्या है, लेकिन दुनिया की समस्या यूरोप की समस्या नहीं है। – एस जयशंकर, विदेश मंत्री

रणनीतिक स्वायत्ततापहले भारत गुटनिरपेक्षता की बात करता था, लेकिन अब भारत सभी पक्षों से संबंध बनाने की नीति पर काम कर रहा है। उदाहरण के तौर पर भारत अमेरिका के साथ क्वाड में हैं और रूस-चीन के साथ ब्रिक्स में भी। भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था उसे ऐसा करने का आत्मविश्वास देती है।

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ग्लोबल साउथ का नेतृत्वभारत अब केवल दक्षिण एशिया का नहीं बल्कि विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) की आवाज बन चुका है। 2023 में दिल्ली में हुए जी-20 सम्मेलन की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाना इसका बड़ा उदाहरण है।

राष्ट्रीय हित सर्वोपरिभारत अब स्पष्ट रूप से अपने हितों को प्राथमिकता देता है। यूक्रेन युद्ध के दौरान पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस से तेल खरीदना इसका सबसे सटीक उदाहरण है, जहां भारत ने ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति को सर्वोपरि रखा।

क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट?भारत की विदेश नीति में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का सिद्धांत बरकरार है। ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ का युग समाप्त हो रहा है। उसकी जगह ले रही है एक ऐसी ‘रणनीतिक स्पष्टता’, जो यथार्थवाद, साझा हितों और दीर्घकालिक दृष्टि पर आधारित है। भारत इसी के आधार पर तमाम देशों से अपने रिश्तों को आकार दे रहा है। – डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव, असिस्टेंट प्रोफेसर, जेएनयू

विदेश नीति को वैचारिक दृष्टिकोण के ढांचे में सीमित सही नहींरूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजरायल हमास संघर्ष की चुनौती, भारत ने राष्ट्रहित और नैतिकता के बीच एक संतुलन स्थापित किया है। अब भारत विदेश नीति को वैचारिक दृष्टिकोण के ढांचे में सीमित रखने में विश्वास नहीं रखता है, बल्कि उसका जोर लचीलेपन पर है।- पवन चौरसिया रिसर्च फेलो, इंडिया फाउंडेशन

 

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