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17 किमी खाट पर ढोया मरीज: गरियाबंद में स्वास्थ्य व्यवस्था की खुली पोल

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दुर्गम गांव भालूडिग्गी में नहीं पहुंचती एम्बुलेंस, इलाज के लिए ग्रामीणों को उठाना पड़ रहा जोखिम।

राधेश्याम सोनवानी,गरियाबंद : जिले में एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने आई है, जिसने सरकारी दावों की पोल खोलकर रख दी है। मैनपुर क्षेत्र के दूरस्थ ग्राम भालूडिग्गी में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के चलते एक गंभीर मरीज को ग्रामीणों ने बांस की खाट पर करीब 17 किलोमीटर तक पहाड़ी और घने जंगलों के रास्ते ढोकर अस्पताल तक पहुंचाया।

जानकारी के मुताबिक, राजीव गांधी गोद ग्राम कुल्हाड़ीघाट के आश्रित ग्राम भालूडिग्गी निवासी मन्नू राम की तबीयत अचानक बिगड़ गई। गांव में स्वास्थ्य सुविधा नहीं होने के कारण ग्रामीणों ने मजबूरी में खाट को कांवर की तरह तैयार किया और दुर्गम रास्तों से पैदल चलते हुए उसे कुल्हाड़ीघाट तक लाए। आरोप है कि यहां भी समय पर सरकारी एम्बुलेंस की सुविधा नहीं मिलने पर इसके बाद निजी वाहन से पहले मैनपुर स्वास्थ्य केंद्र और फिर हालत गंभीर होने पर जिला अस्पताल गरियाबंद रेफर किया गया।

यह घटना न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि आज भी दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं कितनी दूर हैं। एक ओर सरकार मुफ्त इलाज और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी सच्चाई कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है।

इस मामले में क्षेत्रीय विधायक जनकराम ध्रुव ने भी सिस्टम पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सड़क, शिक्षा, पानी और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर कई बार मांग और प्रदर्शन किए गए, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

वहीं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी यू. एस. नवरत्न का कहना है कि संबंधित गांव बेहद दुर्गम क्षेत्र में स्थित है, जहां सड़क और नेटवर्क की समस्या है। उन्होंने कहा है कि यदि पीड़ितों ने 108 एम्बुलेंस को कॉल किया है और उन्हें किसी तरह से रिस्पांस नहीं देते हुए सेवा में लापरवाही बरती गई है, तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी। साथ ही स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए उच्च स्तर पर मांग भी की गई है।

जिला अस्पताल में उपचार–
मामले में डॉ. हरीश चौहान से जानकारी लेने पर बताया कि मनू राम को लगभग डेढ़ बजे दोपहर में भर्ती किया गया। उनका मामला स्ट्रोक का है और दाहिने साइड लकवा मार चुका है। चिकित्सकों की टीम मरीज को उचित उपचार प्रदान कर रही है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब तक ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर इलाज के लिए संघर्ष करना पड़ेगा? क्या यह सिस्टम की नाकामी है या जिम्मेदारों की लापरवाही? और आखिर कब बदलेगी इन दूरस्थ गांवों की तस्वीर?

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