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क्या भारत को फिर मिलेगा ईरानी तेल? ट्रंप प्रशासन के एक फैसले से गिर सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम

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 नई दिल्ली :  वैश्विक ऊर्जा बाजार में मची उथल-पुथल और $120 प्रति बैरल तक पहुंचे कच्चे तेल के दामों के बीच एक बड़ी राहत की खबर आ रही है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन मध्य पूर्व में जारी तनाव को कम करने और तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ईरान के कच्चे तेल पर लगे प्रतिबंधों में बड़ी ढील देने पर विचार कर रहा है।

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के हालिया बयान ने उन अटकलों को तेज कर दिया है कि अमेरिका जल्द ही समुद्र में मौजूद ‘ईरानी तेल कार्गो’ पर से प्रतिबंध हटा सकता है। फॉक्स बिजनेस को दिए एक साक्षात्कार में वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन समुद्र में मौजूद लगभग 140 मिलियन बैरल ईरानी तेल को बाजार में लाने की अनुमति दे सकता है।

उन्होने कहा कि हम अगले 10 से 14 दिनों तक कीमतों को कम रखने के लिए ईरानियों के खिलाफ ईरानी बैरल का इस्तेमाल करेंगे। यह कदम न केवल वैश्विक कीमतों को स्थिर करेगा, बल्कि चीन को होने वाली विशेष आपूर्ति के एकाधिकार को भी तोड़ेगा। इसके अतिरिक्त, अमेरिका अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) से भी तेल निकालने की योजना बना रहा है।

भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?

2019 के मध्य से अमेरिका के दबाव में भारत ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था, जबकि इससे पहले ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था। भारत अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है। ईरान से तेल शुरू होने का मतलब है—कम परिवहन लागत और बेहतर क्रेडिट शर्तें। केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, अपने चरम पर भारतीय आयात में ईरानी तेल की हिस्सेदारी 11.5% थी।

केप्लर के विशेषज्ञ सुमित रितोलिया के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियाँ ईरानी ‘लाइट’ और ‘हेवी’ ग्रेड तेल को प्रोसेस करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्हें इसके लिए किसी बड़े तकनीकी बदलाव की जरूरत नहीं है, बस राजनीतिक हरी झंडी का इंतजार है।

वर्तमान में भारत अपनी जरूरतों के लिए रूस पर काफी निर्भर है (हाल ही में एक हफ्ते में 3 करोड़ बैरल की खरीद)। ईरान का विकल्प खुलने से भारत के पास ‘बार्गेनिंग पावर’ बढ़ेगी और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।

भारत की 35-40% तेल आपूर्ति ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) से होकर गुजरती है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध जैसी स्थिति के कारण यह मार्ग बाधित है। अगर अमेरिका प्रतिबंधों में ढील देता है, तो यह तनाव कम करने का एक ‘डिप्लोमैटिक टूल’ भी बन सकता है, जिससे भारत के तेल टैंकरों को सुरक्षित रास्ता मिल सकेगा।

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