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जलवायु परिवर्तन के दौर में बायोचार और कार्बन क्रेडिट – किसानों और उद्यमियों के लिए नया अवसर

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राधेश्याम सोनवानी, गरियाबंद :- आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की गंभीर समस्या का सामना कर रही है। अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, बढ़ता तापमान, मिट्टी की उर्वरता में कमी और कीट-रोगों का बढ़ता प्रकोप खेती को लगातार प्रभावित कर रहा है। इन परिस्थितियों में खेती को टिकाऊ, लाभकारी और जलवायु-अनुकूल बनाने के लिए नए और वैज्ञानिक समाधानों की आवश्यकता है। इसी दिशा में बायोचार और कार्बन क्रेडिट किसानों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए एक नया अवसर बनकर उभर रहे हैं।
बायोचार कृषि अवशेषों जैसे धान की भूसी, पराली, लकड़ी के टुकड़े और अन्य बायोमास को सीमित ऑक्सीजन में जलाकर बनाया जाने वाला कार्बन-समृद्ध पदार्थ है। इसे मिट्टी में मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, मिट्टी की जल धारण क्षमता में सुधार होता है और लाभकारी सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ती है। इसके उपयोग से रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है और फसल उत्पादन की गुणवत्ता तथा मात्रा दोनों में सुधार होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बायोचार मिट्टी के स्वास्थ्य को लंबे समय तक सुधारने में मदद करता है, इसलिए इसे टिकाऊ कृषि के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीक माना जा रहा है।

छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में बायोचार उत्पादन एक बड़ा उद्यम अवसर बन सकता है। यहाँ धान का उत्पादन अधिक होने के कारण बड़ी मात्रा में कृषि अवशेष उपलब्ध होते हैं, जिन्हें अक्सर जला दिया जाता है। यदि इन अवशेषों से बायोचार बनाया जाए, तो इससे प्रदूषण भी कम होगा और किसानों तथा ग्रामीण युवाओं के लिए आय का नया स्रोत भी तैयार होगा। किसान उत्पादक संगठन (FPO), स्वयं सहायता समूह (SHG) और युवा उद्यमी मिलकर बायोचार उत्पादन इकाइयाँ स्थापित कर सकते हैं और इसे किसानों को बेचकर अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं।

बायोचार से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण पहलू कार्बन क्रेडिट है। जब बायोचार के माध्यम से कार्बन को मिट्टी में स्थायी रूप से संग्रहित किया जाता है, तो यह वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को कम करने में मदद करता है। इस प्रक्रिया को कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन कहा जाता है। इसके आधार पर कार्बन क्रेडिट उत्पन्न होते हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय या स्वैच्छिक कार्बन बाजार में बेचा जा सकता है। इस प्रकार किसान और उद्यमी बायोचार उत्पादन के साथ-साथ कार्बन क्रेडिट से भी अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं।

इस प्रकार बायोचार और कार्बन क्रेडिट केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह किसानों की आय बढ़ाने, मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने, कृषि लागत कम करने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन करने का एक प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। यह मॉडल खेती को जलवायु-स्मार्ट कृषि की दिशा में आगे बढ़ाता है और कृषि अवशेष जलाने की समस्या का भी समाधान प्रस्तुत करता है।

भविष्य में बायोचार आधारित उद्यमिता टिकाऊ कृषि और हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। यदि सरकार, निजी क्षेत्र, किसान संगठन और युवा उद्यमी मिलकर इस दिशा में कार्य करें, तो बायोचार और कार्बन क्रेडिट ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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