बिलासपुर :छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण वाला आदेश जारी किया है। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि परिवार का कोई अन्य सदस्य पहले से सरकारी नौकरी में है।
कोर्ट ने कहा कि प्रशासन को निर्णय लेते समय ‘परिवार की जरूरतों और वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों’ को ध्यान में रखना चाहिए।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला सरगुजा जिले के अंबिकापुर का है। याचिकाकर्ता मुकुंद हेला के पिता शासकीय सेवा में कार्यरत थे, जिनका सेवाकाल के दौरान आकस्मिक निधन हो गया। पिता की मृत्यु के बाद मुकुंद ने नगर पालिका अंबिकापुर में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया।
हालांकि, नगर पालिका के सीएमओ (CMO) ने इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मुकुंद की मां पहले से ही उसी नगर पालिका में चतुर्थ श्रेणी (सफाई कर्मचारी) के पद पर कार्यरत हैं। नियमों का हवाला देते हुए प्रशासन ने इसे दोहरी नियुक्ति का आधार मानकर आवेदन निरस्त कर दिया था।
कोर्ट में दी गई दलीलें
मुकुंद ने अपने अधिवक्ता अनुकूल विश्वास के माध्यम से इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने परिवार की बदहाली का मार्मिक विवरण पेश किया:
- याचिकाकर्ता के परिवार में कई अविवाहित बहनें हैं जो पूरी तरह बेरोजगार हैं।
- मां सफाई कर्मचारी हैं और जल्द ही सेवानिवृत्त (Retire) होने वाली हैं, जिसके बाद परिवार की आय का कोई जरिया नहीं बचेगा।
- वर्तमान में मां के वेतन से गुजारा न होने के कारण उन्हें मजबूरी में दूसरे के घरों में झाड़ू-पोछा तक करना पड़ रहा है।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी और आदेश।
मामले की गंभीरता और परिवार की माली हालत को देखते हुए जस्टिस एके प्रसाद ने शासन के तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहाकि”परिवार के किसी एक सदस्य के सरकारी नौकरी में होने मात्र को अनुकंपा नियुक्ति न देने का आधार बनाना गलत है। अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य परिवार को तात्कालिक आर्थिक संकट से उबारना है।”
हाईकोर्ट ने राज्य शासन को आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता के प्रकरण पर उसकी पारिवारिक जरूरतों और कमजोर आर्थिक स्थिति के आधार पर पुनर्विचार करें और अनुकंपा नियुक्ति प्रदान करने की दिशा में कार्रवाई करें।



