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गीता में श्रीकृष्ण ने किन 3 आदतों को बताया है ‘नरक का द्वार’? आज ही बना लें दूरी

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श्रीमद्भगवद्गीता (Bhagwat Geeta) केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बेहतरीन लाइफ मैनेजमेंट ग्रंथ है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को न सिर्फ युद्ध जीतने का ज्ञान दिया, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े ऐसे सूत्र भी बताए जो हमें दुखों से बचा सकते हैं।

गीता में श्रीकृष्ण ने इंसान की 3 ऐसी बुरी आदतों का जिक्र किया है, जिन्हें उन्होंने सीधे तौर पर ‘नरक का द्वार’ (Doors to Hell) कहा है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, डिप्रेशन और आपसी कलह की सबसे बड़ी जड़ यही तीन आदतें हैं। आइए जानते हैं ये कौन सी आदतें हैं और इनसे कैसे बचा जाए:

1. बेलगाम इच्छाएं (काम)

श्रीकृष्ण के अनुसार, जीवन जीने के लिए इच्छाएं होना स्वाभाविक है, लेकिन जब ये बेकाबू हो जाती हैं तो इंसान के पतन का कारण बनती हैं। आज की ‘दिखावे की दुनिया’ (Consumer Culture) में हमें हमेशा कुछ नया और बड़ा चाहिए- महंगी कार, लेटेस्ट फोन या लग्जरी लाइफ। जब ये इच्छाएं हमारी जरूरत से ज्यादा हमारी सनक बन जाती हैं, तो हम सही-गलत का फर्क भूल जाते हैं और अपनी मर्यादाएं लांघने लगते हैं। पतन की शुरुआत यहीं से होती है।

2. गुस्सा (क्रोध)

आजकल सड़क पर ट्रैफिक हो या घर में छोटी सी बहस, इंसान तुरंत आगबबूला हो जाता है। गीता में बताया गया है कि क्रोध हमारी बुद्धि को खा जाता है। जब गुस्सा हावी होता है, तो हमारी सोचने-समझने की ताकत खत्म हो जाती है। गुस्से में लिया गया एक गलत फैसला या मुंह से निकला एक कड़वा शब्द सालों की मेहनत और गहरे रिश्तों को पल भर में खत्म कर सकता है। शांति ही वह एकमात्र रास्ता है, जो इंसान को इस मानसिक नरक से बचा सकता है।

3. लालच (लोभ)

तीसरा और सबसे खतरनाक द्वार है ‘लोभ’। आज भ्रष्टाचार, बेईमानी और टूटते रिश्तों की सबसे बड़ी वजह यही लालच है। लोभी इंसान के पास चाहे जितना भी आ जाए, उसे कम ही लगता है। वह हमेशा ‘और ज्यादा’ की चाह में भागता रहता है और अपने वर्तमान के सुकून को दांव पर लगा देता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि लोभ एक ऐसी जंजीर है जो आत्मा को जकड़ लेती है और कभी चैन से जीने नहीं देती।

गीता के किस अध्याय में मिलता है इसका जिक्र?

श्रीमद्भगवद्गीता के 16वें अध्याय, जिसका नाम ‘दैवासुरसम्पद्विभागयोग’ है, में इन बातों का गहराई से वर्णन किया गया है। इस अध्याय में भगवान ने अच्छे (दैवी) और बुरे (आसुरी) स्वभाव वाले लोगों के लक्षणों को स्पष्ट किया है।

विशेष तौर पर श्लोक संख्या 21 में इसका सटीक वर्णन मिलता है:

“त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: | काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ||”

अर्थ: काम (इच्छा), क्रोध (गुस्सा) और लोभ (लालच)- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं, जो इंसान की आत्मा का नाश करते हैं (उसे नीचे गिराते हैं)। इसलिए हर व्यक्ति को इन तीनों का तुरंत त्याग कर देना चाहिए।

इनसे बचने के रास्ते

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मार्ग दिखाते हुए समझाया था कि जो इंसान इन तीनों विकारों को अपने मन से निकाल देता है, वही अपना सच्चा कल्याण कर पाता है। अंततः उसे ही परम गति, शांति और सुख की प्राप्ति होती है। सच तो यह है कि नरक कहीं आसमान या पाताल में नहीं है, बल्कि हमारी इन बुरी आदतों के भीतर ही बसा है।

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