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गरुड़ पुराण: पितृ ऋण से मुक्ति और मोक्ष का द्वार है ‘विवाह’, पढ़ें क्यों सन्यास से बेहतर है गृहस्थ आश्रम?

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हिंदू धर्म में बताए गए 16 संस्कारों में ‘विवाह’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे गृहस्थ आश्रम की पहली सीढ़ी माना जाता है। आमतौर पर लोग विवाह को वंश बढ़ाने या साथ रहने का माध्यम मानते हैं, लेकिन गरुड़ पुराण में इसका एक गहरा आध्यात्मिक पहलू बताया गया है। इसमें विवाह को स्वर्ग की प्राप्ति और मोक्ष का आधार माना गया है।

गरुड़ पुराण और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, विवाह केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग है। जानें ऋषि रुचि और उनके पितरों के बीच का वह संवाद जिसने सन्यास और गृहस्थ का भेद मिटा दिया।

रुचि प्रजापति और उनका सन्यास मार्गप्राचीन काल में रुचि नाम के एक प्रजापति हुए, जो अत्यंत ज्ञानी और मोह-माया से मुक्त थे। उन्होंने घर-बार त्याग दिया था, वे दिन में केवल एक बार भोजन करते थे और अकेले ही वन-वन भ्रमण करते थे। उनका मानना था कि विवाह दुखों का कारण है और आत्मा की शुद्धि केवल सन्यास से ही संभव है।

जब पितरों ने दिया मोक्ष का ज्ञानउनकी इस अकर्मण्यता को देखकर उनके पूर्वज यानी पितृगण उनके सामने प्रकट हुए। प्राचीन पितृ स्तोत्र व्याख्या के अनुसार, मार्कण्डेय जी ने इस प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया है कि पितरों ने रुचि प्रजापति से उनके अविवाहित होने का कारण पूछा। पितरों ने स्पष्ट किया कि जिसे वे बंधन समझ रहे हैं, वास्तव में वही विवाह स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति का वास्तविक माध्यम है।

पितरों ने रुचि को समझाया कि गृहस्थ आश्रम के बिना व्यक्ति कभी भी उन ऋणों से मुक्त नहीं हो सकता जो उसके जन्म के साथ जुड़े हैं।

गरुड़ पुराण और ‘ऋण’ का महत्वविवाह की इस आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट करते हुए गरुड़ पुराण (आचार कांड) में बताया गया है कि एक गृहस्थ व्यक्ति ही देवताओं, पितरों, ऋषियों और याचकों की पूजा करके उत्तम लोक प्राप्त कर सकता है। गरुड़ पुराण के अनुसार:

  • देवताओं को ‘स्वाहा’ शब्द के साथ आहुति देना।
  • पितरों को ‘स्वधा’ शब्द के उच्चारण के साथ तर्पण करना।
  • अतिथि को अन्न दान देकर प्रसन्न करना।

(गरुड़ पुराण और मार्कण्डेय पुराण दोनों में ही यह स्पष्ट किया गया है कि बिना ‘स्वधा’ के पितृ तर्पण अधूरा रहता है और वह उन तक नहीं पहुंचता।)

ये सभी कार्य केवल एक विवाहित गृहस्थ ही पूर्ण कर सकता है। पितरों ने रुचि प्रजापति को चेतावनी दी कि अगर वे संतान की उत्पत्ति, देव पूजा और पितृ तर्पण जैसे कर्तव्यों को पूरा किए बिना ही स्वर्ग की इच्छा रखते हैं, तो उन्हें केवल कष्ट मिलेगा। गरुड़ पुराण यह भी कहता है कि इन ऋणों को चुकाए बिना व्यक्ति मृत्यु के बाद नरक की दुर्गति भोगता है।

रुचि प्रजापति ने तर्क दिया कि विवाह तो पाप और दुखों को बढ़ाता है। इस पर पितरों ने एक बहुत ही सुंदर समाधान दिया। उन्होंने कहा कि शुभ या अशुभ कर्म स्वयं बंधन नहीं होते, बल्कि उन्हें त्यागने का हठ पाप उत्पन्न करता है। मार्कण्डेय पुराण के रुचि प्रजापति संवाद में पितृ समझाते हैं कि जिस प्रकार पहले के कर्म भोग से समाप्त होते हैं, उसी प्रकार शास्त्र सम्मत गृहस्थ कर्म करने से आत्मा शुद्ध होती है।

पितरों ने कहा कि वेदों में कर्म मार्ग को ‘अविद्या’ (सांसारिक माया) कहा गया है, लेकिन यही कर्म ‘विद्या’ (परम ज्ञान) तक पहुंचने का माध्यम है। जो व्यक्ति सन्यास के नाम पर अपने कर्तव्यों से भागता है, वह वास्तव में स्वयं को पाप की अग्नि में जलाता है।

क्यों है विवाह जरूरी?पितरों की आज्ञा पाकर रुचि प्रजापति ने विधिपूर्वक विवाह किया। इस कथा का सार यही है कि धर्म का पालन करते हुए गृहस्थ जीवन जीना ही व्यक्ति का असली कल्याण है। विवाह केवल दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि पितृ ऋण और देव ऋण से मुक्ति पाकर मोक्ष की ओर बढ़ने का एक अनुशासित मार्ग है।

 

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