मां- यह सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसा एहसास है, जिसमें दुनिया भर का सुकून बसा होता है। हम सबकी लाइफ में मां की जगह सबसे खास होती है। इस दुनिया में कदम रखते ही हमारा सबसे पहला रिश्ता और सबसे पहला स्पर्श मां से ही जुड़ता है।
चाहे लाइफ में कोई बड़ी टेंशन हो, किसी बात का डर हो, या फिर अचानक से कोई चोट लग जाए… तकलीफ के वक्त सबसे पहले जुबां से एक ही नाम निकलता है- “मां”। लेकिन क्या आपने कभी गहराई से सोचा है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? हम चाहे कितने भी बड़े और समझदार क्यों न हो जाएं, दर्द होने पर आज भी दिल और जुबां से सबसे पहले मां ही क्यों याद आती हैं?
इस मदर्स डे (Mother’s Day) पर, हमने इस बेहद खूबसूरत कनेक्शन के पीछे की असली वजह जानने के लिए सीनियर साइलोकॉजिस्ट मोनिका शर्मा से बात की। आइए विस्तार से समझते हैं कि क्या है हमारी इस भावना के पीछे का मनोविज्ञान:-
इस दुनिया में आने के बाद से ही एक बच्चे के लिए उसकी मां सुरक्षा, आराम और राहत का सबसे पहला जरिया होती है। बचपन में जब भी हमें भूख लगती थी, डर लगता था या चोट लगती थी, तो मां ही वह इंसान थी, जो हमें उस तकलीफ से बाहर निकालती थी और गले लगाती थी। हमारे दिमाग में यह बात हमेशा के लिए दर्ज हो जाती है कि “मां का मतलब है दर्द से राहत और पूर्ण सुरक्षा”।
बचपन से लेकर बड़े होने तक, हमारे दिमाग में मां के प्यार और सुरक्षा की प्रोग्रामिंग हो जाती है। जब हमें अचानक कोई तेज दर्द होता है या झटका लगता है, तो हमारा कॉन्शियस माइंड में ज्यादा सोचने-समझने का समय नहीं ले पाता। ऐसी स्थिति में हमारा अवचेतन मन तुरंत अपनी सबसे पुरानी और भरोसेमंद एहसास को खोजता है, और वह नाम ‘मां’ का होता है।
मनोवैज्ञानिक कारण होने के अलावा इसके पीछे एक बहुत व्यावहारिक और भाषाई कारण भी है। दुनिया की लगभग हर भाषा में ‘मां’ शब्द के लिए ‘म’ या ‘आ’ की ध्वनि का इस्तेमाल होता है जैसे- मां, मम्मी, मॉम, मम्मा, अम्मा।
ऐसे में जब इंसान दर्द में होता है, तो फेफड़ों से स्वाभाविक रूप से “आ” या “अह” की आवाज (कराह) निकलती है। बोलते समय होंठों को जरा-सा मिलाने पर यह आवाज बिना किसी प्रयास के आसानी से “मां” की ध्वनि में बदल जाती है। दर्द के समय इस शब्द को बोलने के लिए जुबान या दिमाग को कोई जोर नहीं लगाना पड़ता।
मनोविज्ञान के मुताबिक, जब इंसान बहुत ज्यादा तनाव, सदमे या शारीरिक दर्द में होता है, तो वह मानसिक रूप से अपने जीवन के सबसे सुरक्षित दौर आमतौर पर बचपन में वापस लौट जाता है। इसे मनोविज्ञान में ‘रिग्रेशन’ कहते हैं। दर्द के उस पल में, हम अनजाने में उसी सुरक्षित और बिना शर्त वाली देखभाल को पुकारते हैं, जो हमें एक बच्चे के रूप में मां से मिलती थी।



