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“अंतरराष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस” पर विशेष लेख: सुरक्षित बचपन से ही बनेगा विकसित भारत: गुमशुदा बच्चों के खिलाफ मजबूत अभियान की जरूरत

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एमसीबी :बचपन किसी भी समाज की सबसे अनमोल धरोहर होता है। बच्चों की हंसी, उनकी मासूमियत, उनके सपने और उनकी ऊर्जा ही किसी राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की नींव बनाते हैं। जब कोई बच्चा अपने परिवार से बिछड़ जाता है, गुम हो जाता है या अपराध का शिकार बनता है, तब केवल एक परिवार का दर्द नहीं बढ़ता बल्कि पूरा समाज कहीं न कहीं अपनी संवेदनशीलता की परीक्षा में खड़ा दिखाई देता है। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष 25 मई को “अंतरराष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस” मनाया जाता है, ताकि समाज, प्रशासन और परिवारों को बच्चों की सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जा सके तथा यह संदेश दिया जा सके कि हर बच्चे का सुरक्षित बचपन उसका मौलिक अधिकार है।आज का समय तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश, तकनीकी विस्तार और डिजिटल प्रभावों का समय है। इंटरनेट और मोबाइल तकनीक ने जहां दुनिया को सरल बनाया है, वहीं बच्चों के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी की हैं। ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया, साइबर अपराध, मानव तस्करी, मानसिक तनाव और पारिवारिक संवाद की कमी जैसी समस्याएं बच्चों को असुरक्षित बना रही हैं। कई बार बच्चे डर, अवसाद, परीक्षा के दबाव, घरेलू विवाद या गलत संगति के कारण घर छोड़ देते हैं। कई बार अपराधी मानसिकता वाले लोग मासूम बच्चों को अपने जाल में फंसा लेते हैं। ऐसे में बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं रह जाती, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बन जाती है।

मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में बच्चों की सुरक्षा को लेकर जिस प्रकार संवेदनशीलता और सक्रियता दिखाई गई है, वह एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करता है। जनवरी 2020 से अप्रैल 2026 तक जिले में कुल 431 बच्चे गुम हुए, जिनमें से अधिकांश बच्चों को सुरक्षित खोजकर उनके परिवारों तक पहुंचाया गया। 93.38 प्रतिशत बरामदगी दर यह साबित करती है कि यदि प्रशासन, पुलिस और समाज समन्वित प्रयास करें तो बच्चों को सुरक्षित वापस लाना संभव है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की लौटती मुस्कान और प्रशासन की संवेदनशील कार्यशैली का प्रतीक है।
इन मामलों में 200 से अधिक बच्चों से जुड़े अपराधों का सामने आना समाज को गंभीर चेतावनी भी देता है। यह बताता है कि बच्चों के विरुद्ध अपराधों की चुनौती अब भी मौजूद है और इसके लिए निरंतर सतर्कता की आवश्यकता है। मानव तस्करी का एक मामला भी यह संकेत देता है कि अपराधी नेटवर्क बच्चों को निशाना बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे समय में पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत 209 मामलों में की गई चालानी कार्रवाई यह दर्शाती है कि जिला प्रशासन और पुलिस बच्चों के विरुद्ध अपराधों को लेकर किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरत रहे हैं।

संवेदनशील शासन व्यवस्था से मजबूत हो रही बाल सुरक्षा
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में महिला और बाल सुरक्षा को शासन की प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया गया है। राज्य सरकार द्वारा कानून व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ बच्चों से जुड़े अपराधों पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में लगातार कार्य किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री द्वारा समय-समय पर अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए जाते रहे हैं कि बच्चों और महिलाओं से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता, तत्परता और न्याय सर्वाेच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।राज्य सरकार का दृष्टिकोण केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना है जहां बच्चे भयमुक्त होकर अपना जीवन जी सकें। बाल संरक्षण, शिक्षा, पोषण और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया गया है। यही कारण है कि आज बाल अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े विषयों पर समाज में जागरूकता लगातार बढ़ रही है। वहीं प्रदेश के गृह मंत्री विजय शर्मा द्वारा पुलिस तंत्र को आधुनिक तकनीकों से सशक्त बनाने पर विशेष बल दिया जा रहा है। गुमशुदा बच्चों की खोज के लिए चलाए जा रहे “ऑपरेशन तलाश” और भारत सरकार के केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया ष्ऑपरेशन मुस्कानष् एक बेहद महत्वपूर्ण राष्ट्रव्यापी अभियान है, जिसका मुख्य उद्देश्य लापता और खोए हुए बच्चों को ढूंढना, उनका रेस्क्यू करना और उन्हें उनके परिवारों से मिलाना है। विभाग के द्वारा रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, सार्वजनिक स्थानों और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई गई है। साइबर सेल और तकनीकी जांच व्यवस्था को मजबूत बनाकर बच्चों को ऑनलाइन अपराधों से बचाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं।

इसके साथ ही महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के मार्गदर्शन में बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण से जुड़ी योजनाओं का प्रभावी संचालन किया जा रहा है। आंगनबाड़ी केंद्रों, ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण समितियों और किशोरी बालिका कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों तक जागरूकता पहुंचाई जा रही है। बच्चों के अधिकारों, बाल विवाह रोकथाम, बाल तस्करी और संकटग्रस्त बच्चों के पुनर्वास को लेकर विभाग लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

तकनीक और जागरूकता से बदल रही सुरक्षा की तस्वीर
आज का दौर तकनीक का दौर है और तकनीक का सही उपयोग बच्चों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 जैसी सेवाएं संकट में फंसे बच्चों के लिए जीवन रेखा साबित हो रही हैं। यह सेवा केवल एक नंबर नहीं बल्कि हजारों बच्चों के लिए सुरक्षा और भरोसे का माध्यम बन चुकी है। किसी भी संदिग्ध परिस्थिति में तत्काल सहायता उपलब्ध कराना इस सेवा की सबसे बड़ी विशेषता है।
स्कूलों और कॉलेजों में साइबर सुरक्षा जागरूकता अभियान चलाकर बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाव की जानकारी दी जा रही है। सोशल मीडिया पर अनजान लोगों से दूरी बनाए रखना, निजी जानकारी साझा न करना, ऑनलाइन गेमिंग के जोखिमों को समझना और साइबर बुलिंग से बचाव जैसे विषयों पर बच्चों को शिक्षित किया जा रहा है। यह सकारात्मक पहल आने वाले समय में बच्चों को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद करेगी।

वहीं “मिशन वात्सल्य” जैसी योजनाएं अनाथ, बेसहारा और संकटग्रस्त बच्चों के पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। यह योजना केवल सहायता प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को सम्मानजनक जीवन, शिक्षा और भावनात्मक सुरक्षा देने का प्रयास भी करती है। ग्राम और वार्ड स्तर पर गठित बाल संरक्षण समितियां भी स्थानीय स्तर पर बच्चों की निगरानी और सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
बदलते समय में यह समझना बेहद आवश्यक है कि बच्चों की सुरक्षा केवल भौतिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है। मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। कई बच्चे तनाव, अकेलेपन और संवादहीनता के कारण गलत कदम उठा लेते हैं। इसलिए परिवारों को बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार करना होगा। बच्चों की बातें सुनना, उनके भावनात्मक बदलावों को समझना और उन्हें विश्वास का वातावरण देना अत्यंत आवश्यक है।

परिवार और समाज की जागरूकता ही सबसे बड़ी ताकत
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की सुरक्षा की पहली पाठशाला परिवार होता है। यदि घर का वातावरण सकारात्मक और संवादपूर्ण हो, तो बच्चे अपने मन की बातें आसानी से साझा करते हैं। माता-पिता को बच्चों पर केवल अनुशासन थोपने के बजाय उनके मित्र बनने की आवश्यकता है। बच्चों के भीतर यदि कोई डर, तनाव या उलझन है तो उसे समय रहते समझना जरूरी है।आज कई परिवारों में मोबाइल और डिजिटल व्यस्तता ने संवाद को कम कर दिया है। बच्चे घंटों मोबाइल पर समय बिताते हैं लेकिन उनके मन की बात सुनने वाला कोई नहीं होता। यही दूरी कई बार बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर बना देती है। इसलिए यह समय बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने का है। उनके सपनों, परेशानियों और भावनाओं को समझने का है।

समाज की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि कोई बच्चा असामान्य परिस्थिति में दिखाई दे, डरा हुआ लगे या किसी संदिग्ध व्यक्ति के साथ नजर आए, तो तत्काल पुलिस या चाइल्ड हेल्पलाइन को सूचना देना हर नागरिक का कर्तव्य होना चाहिए। कई बार एक छोटी सी सजगता किसी बच्चे की जिंदगी बचा सकती है। समाज जितना संवेदनशील होगा, बच्चों के लिए वातावरण उतना ही सुरक्षित बनेगा।शिक्षकों की भूमिका भी यहां अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। स्कूल केवल शिक्षा देने का माध्यम नहीं बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का केंद्र भी होते हैं। शिक्षक यदि बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव, तनाव या भय के संकेत पहचान लें तो समय रहते सहायता पहुंचाई जा सकती है। इसलिए स्कूलों में काउंसलिंग व्यवस्था और बाल सुरक्षा संबंधी कार्यक्रमों को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है।

सुरक्षित बचपन ही विकसित समाज और मजबूत राष्ट्र की नींव
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति उसके बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और खुशहाली से तय होती है। जिस समाज में बच्चे सुरक्षित होते हैं, वही समाज वास्तव में सभ्य और विकसित कहलाता है। अंतरराष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस हमें यही संदेश देता है कि बच्चों की सुरक्षा कोई औपचारिक विषय नहीं बल्कि मानवता का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व है। एमसीबी जिले में गुमशुदा बच्चों की बरामदगी में मिली सफलता यह दर्शाती है कि संवेदनशील प्रशासन, सक्रिय पुलिस व्यवस्था और जागरूक समाज मिलकर सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यह उपलब्धि केवल प्रशासनिक सफलता नहीं बल्कि सामाजिक जागरूकता और मानवीय संवेदनशीलता की जीत भी है।आज आवश्यकता इस बात की है कि हर परिवार अपने बच्चों के साथ मजबूत संवाद बनाए, हर स्कूल बच्चों को सुरक्षित वातावरण दे, हर नागरिक सजग रहे और हर संस्था बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आए। जब समाज और शासन मिलकर कार्य करते हैं, तब किसी भी चुनौती का समाधान संभव हो जाता है।

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